भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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१३२ पञ्चदशी कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्प्रतिबिम्बकः । प्राणानां धारणाज्जीवः संसारेण स युज्यते ॥२३॥ बुद्धि उस कूटस्थ में कल्पित है । उस बुद्धि में चेतन का जो प्रतिबिम्ब है, वह जब प्राणों को धारण कर लेता है तब उसको 'जीव' कहने लगते हैं । यह जीव ही संसार में फँसा करता है । [ कूटस्थ आत्मा संसार से युक्त कभी नहीं होता ] जलव्योम्ना घटाकाशो यथा सर्वस्तिरोहितः । तथा जीवेन कूटस्थः सोऽन्योऽन्याध्यास उच्यते ॥२४॥ जैसे जलाकाश सम्पूर्ण घटाकाश को ढक देता है [उसे दीखने नहीं देता ] इसी प्रकार इस जीव ने कूटस्थ आत्मा को तिरोहित कर डाला है [ उसे प्रकट नहीं रहने दिया है ] इसी तिरोधान को [ भाष्यादि में ] 'अन्योन्याध्यास' कहा गया है । अयं जीवो न कूटस्थं विविनक्ति कदाचन । अनादिरविवेकोऽयं मूलाविद्येति गम्यताम् ॥२५॥ यह जीव कभी भी उस कूटस्थ तत्व को पृथक् नहीं पहचा- नता है । अनादि काल से चली आने वाली उसकी यह जीव और कूटस्थ की भेदा प्रतीति ही 'मूलाविद्या' कहाती है [इस अविद्या से ही अन्योन्याध्यास की उत्पत्ति हुआ करती है ] विक्षेपावृतिरूपाभ्यां द्विधाऽविद्या व्यवस्थिता । न भाति नास्ति कूटस्थ इत्यापादनमावृतिः ॥२६॥ 'विक्षेप' और 'आवृति' इन दो भेदों से अविद्या दो प्रकार की होती है । 'कूटस्थ नाम की चीज़ न तो प्रतीत ही होती है और न वह है ही' ऐसा मिथ्या व्यवहार करानेवाला 'आव- रण' कहाता है ।