पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८८ पञ्चदशी आनन्दमय ईशोऽयं बहु स्यामित्यवैक्षत । हिरण्यगर्भरूपोऽभूत् सुप्तिः स्वप्नो यथा भवेत् ॥१९८॥ [आनन्दमय ईश्वर ही जगत् का कारण है यह सिद्ध हो चुका । उससे जगत् की उत्पत्ति कैसे होती है वह रीति अब बतायी जाती है] गाढ निद्रा का ही जैसे [पिछली रात में] स्वप्न हो जाता है, इसी प्रकार इस आनन्दमय ईश्वर ने पड़े पड़े यह विचार किया कि 'अब मैं बहुरूप हो जाऊँ'। इस विचार के करते ही बस वह हिरण्यगर्भरूप हो गया। मानो सुषुप्ति का ही सपना बन गया । क्रमेण युगपद्वैषा सृष्टिर्ज्ञेया यथाश्रुति । द्विविधश्रुतिसद्भावाद् द्विविधस्वप्नदर्शनात् ॥१९९॥ श्रुति के कथनानुसार क्रम से अथवा एक साथ ही यह सृष्टि उत्पन्न होगयी, यह जान लेना चाहिये। क्योंकि दोनों ही प्रकार की श्रुतियें विद्यमान हैं, तथा दोनों ही प्रकार के स्वप्न भी देखे जाते हैं। [तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः (तै. २-१) इत्यादि श्रुति में क्रमोत्पन्न सृष्टि का वर्णन है । इदं सर्वमसृजत (बृह. १- २-५) इत्यादियों में युगपत् सृष्टि का वर्णन आता है । श्रुत्यनु- कूल होने से दोनों ही बातें माननीय हैं। लोक में भी दो तरह के स्वप्न देखे जाते हैं—किसी स्वप्न में तो क्रम से पदार्थ उत्पन्न होते हैं, तथा किसी में सब के सब पदार्थ एक साथ उत्पन्न हो पड़ते हैं] । सूत्रात्मा सूक्ष्मदेहाख्यः सर्वजीवघनात्मकः । सर्वाहंमानधारित्वात् क्रियाज्ञानादिशक्तिमान् ॥२००॥