भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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• चित्रदीपप्रकरणम् १८९

में अनुस्यूत रहनेवाले उस] सूत्रात्मा [हिरण्यगर्भ] को सूक्ष्म देह भी कहते हैं। सम्पूर्ण [व्यष्टि लिंग शरीरों] में अहंभाव का अभिमान करने के कारण वह सूत्रात्मा [लिंग शरीररूपी उपाधि वाले] सम्पूर्ण जीवों की समष्टि रूप है, उस सूत्रात्मा में 'इच्छा, ज्ञान, तथा क्रिया' ये तीन शक्तियें रहती हैं। [समष्टि का स्वभाव हम व्यष्टियों में भी पाया जाता है। हमें पहले किसी पदार्थ का ज्ञान होता है, फिर उसकी इच्छा होती है फिर उसके लिये क्रिया या उद्योग किया जाता है। यों यह सारा संसार ज्ञान, इच्छा और क्रिया के ही अनन्त भँवर में चक्कर काटता रहता है। तत्त्वज्ञान हो जाने पर ज्ञान इच्छा और क्रिया का यह चक्कर बन्द हो जाता है। प्रत्यूषे वा प्रदोषे वा मग्नो मन्दे तमस्ययम् । लोको भाति यथा तद्वदस्पष्टं जगदीक्ष्यते ॥२०१॥ जैसे प्रातःकाल या सायंकाल के समय यह जगत् मन्द अन्धकार में डूबा हुआ धुँधला धुँधला दीखा करता है, इसी प्रकार इस हिरण्यगर्भावस्था में यह जगत् अस्पष्ट रूप से दीखा करता है। [हिरण्यगर्भ की अवस्था हमारी मनोराज्य की अवस्था जैसी है]। सर्वतो लाञ्छितो मष्या यथा स्याद् घट्टितः पटः । सूक्ष्माकारै स्तथेशस्य वपुः सर्वत्र लाञ्छितम् ॥२०२॥ जिस प्रकार कलफ़ किये हुए सम्पूर्ण कपड़े पर, [रंग भरने के लिये] स्याही से आकार बना दिये जाते हैं, इसी प्रकार इस [मायी हिरण्यगर्भ नाम के] महेश्वर का शरीर भी [अपंची- कृत भूतों से बने हुए] लिंग शरीरों से सभी जगह लाञ्छित हुआ रहता है।