पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 21, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वविवेकप्रकरणम् ३ स्वप्न में भी यही होता है, [वहां भी ज्ञान में भेद नहीं होता। विशेषता इतनी है कि] इस स्वप्न-काल में वेद्य पदार्थ स्थिर नहीं होते, [प्रातिभासिक होते हैं] जागरण में तो वे स्थिर [व्यावहा- रिक] होते हैं। इस कारण स्वप्न और जागरण का तो भेद हो जाता है। परन्तु इन दोनों अवस्थाओं में होने वाला 'ज्ञान' तो एकरूप ही है। इसी से उसमें भेद नहीं होता। जिस प्रकार जागरण में विचित्रता के कारण, विषयों का तो भेद है, तथा एकरूपता के कारण ज्ञान का अभेद है, ठीक यही अवस्था स्वप्न की भी है। इन्द्रियों का उपसंहार हो जाने पर जागरण के संस्कारों से उत्पन्न हुआ विषय सहित ज्ञान 'स्वप्न' कहाता है। उस स्वप्नावस्था में भी केवल विषय ही परस्पर भिन्न होते हैं। ज्ञान में तब भी कोई भेद नहीं होता। स्वप्न और जाग- रण में भेद तो केवल इतना ही है कि स्वप्न में दृश्यमान वेद्य पदार्थ स्थिर नहीं होते, वे केवल प्रातीतिक होते हैं। जागरण में तो दीखने वाली वस्तुयें स्थायी होती हैं। वे कालान्तर में भी देखी जा सकती हैं। केवल अस्थिरता और स्थिरता के कारण ही इन दोनों में भेद है। परन्तु उन दोनों के ज्ञान में भेद नहीं है क्योंकि वह तो एकरूप ही है। सुप्तोत्थितस्य सौषुप्ततमोबोधो भवेत् स्मृतिः । सा चावबुद्धविषयाऽवबुद्धं तत्तदा तमः ॥५॥ सोकर उठे हुए पुरुष को जब सुषुप्ति काल के अज्ञान का बोध होता है तो वह उसकी स्मृति होती है, वह स्मृति जाने बूझे विषय की ही होती है। [ जिसका मतलब वह है कि ] उसने सोते समय तम अथवा अज्ञान को जाना था।