भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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२ पञ्चदशी शब्दस्पर्शादयो वेद्या वैचित्र्याज्जागरे पृथक् । ततो विभक्ता तत्संविदैकरूप्यान्न भिद्यते ॥३॥ जागरण अवस्था में, शब्द स्पर्श आदि वेद्य पदार्थ विचित्रता के कारण पृथक्-पृथक् होते हैं, परन्तु उनका ज्ञान उनसे विभक्त रहना है। एक रूप होने के कारण उस ज्ञान में कभी भेद नहीं होता। इन्द्रियों से विषयों के ग्रहण को ‘जागरण’ कहते हैं। उस जागरण नाम की अवस्था में वेद्य कहलाने वाले जो शब्द स्पर्श आदि पदार्थ हैं तथा उनके आश्रय जो आकाशादि पदार्थ हैं, वे विचित्रता के कारण परस्पर भिन्न भिन्न होते हैं। परन्तु उन शब्दादियों का [बुद्धि की सहायता लेकर उनसे पृथक् किया हुआ] ज्ञान, एक ही रूप का होने के कारण, अथवा ज्ञान-ज्ञान- ज्ञान-इस समान रूप से प्रतीत होने के कारण, आकाश के समान ही भिन्न नहीं हो जाता। दूसरे शब्दों में इसे यों कहना चाहिये कि ज्ञान में स्वभाव से कोई भेद ही नहीं है। क्योंकि आकाश के समान उपाधि के परामर्श [कथन] के बिना उसमें भेद की संभावना ही नहीं रहती। शब्द-ज्ञान में स्पर्श-ज्ञान से स्वयं कोई भेद नहीं है, क्योंकि ज्ञान ज्ञान सब एक से ही होते हैं। उनमें जो भेद प्रतीत होने लगा है, वह तो औपाधिक भेद है। ऐसे तो एक अखण्ड आकाश में भी घटाकाश मठाकाश आदि भेद पाये जाते हैं। परन्तु वह सच्चे भेद नहीं होते। उन औपाधिक भेदों से जैसे आकाश में भेद नहीं आता, इसी प्रकार औपाधिक भेदों से ज्ञान में भी भेद को अवकाश नहीं मिलता। तथा स्वप्ने, ऽत्र वेद्यं तु न स्थिरं जागरे स्थिरम् । तद्भेदात्तत्तयोः संविदेकरूपा न भिद्यते ॥४॥