भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 210

१९२ पञ्चदशी अद्वितीयब्रह्मतत्वे स्वप्नोऽयमखिलं जगत् । ईशजीवादिरूपेण चेतनाचेतनात्मकम् ॥२११॥ ईश्वर और जीव आदि के रूप से वर्तमान जो यह जडा- त्मक और चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् है यह सब उस अद्वितीय ब्रह्मतत्व में एक [बड़ा] सुपना है [क्योंकि यह सब अद्वितीय ब्रह्मतत्व को ही तो अन्यथा समझ लिया गया है ] । सुपना 'सुपना' है, यथार्थ ज्ञान नहीं है यह बात जागने से पहले मालूम नहीं पड़ सकती, जागने पर ही यह मालूम पड़ा करता है । इसी प्रकार 'यह जगत् एक सुपना है, ऐसा ज्ञान ब्रह्मविद्या नाम के जागरण के हो जाने पर ही हो सकता है, पहले नहीं । आनन्दमयविज्ञानमया वीश्वरजीवकौ । मायया कल्पितावेतौ ताभ्यां सर्वं प्रकल्पितम् ॥२१२॥ आनन्दमय और विज्ञानमय जिनको ईश्वर और जीव भी कहते हैं, दोनों ही माया के कल्पित किये हुए हैं। [इस कारण ये ईश्वर तथा जीव यद्यपि ब्रह्म से अभिन्न हैं तौ भी ये जगत् के अन्दर की ही वस्तुएँ हैं, ये जगत् के बाहर की वस्तुएँ नहीं हैं]। इन ईश्वर और जीव दोनों ने मिलकर पीछे से यह सब कल्पित कर डाला है । विज्ञान के बाद आनन्द आता है । विज्ञान भिन्न भिन्न होते हैं । आनन्द सब को एक जैसा ही आता है । शूकर को शूक्री से जितना आनन्द आता है, राजा को रानी से भी उतना ही— उस जैसा ही आनन्द आता है । यों आनन्द नाम का जो ईश्वर तत्व है वह एक जैसा है—एक है । परन्तु आनन्द को प्रकट