भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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करनेवाले—उसका दर्शन करने वाले, जो विज्ञानमय हैं, वे भिन्न भिन्न हैं। यही तो ईश्वर और जीव का वेदान्तसम्मत भेद है। ये दोनों ही माया के कल्पित हैं। ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशेन कल्पिता। जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकल्पितः ॥२१३॥ [ईश्वर और जीव इन दोनों में से किसने कितना जगत् बनाया है सो भी सुनो] ‘स ऐक्षत लोकान्नु सृजा’ (ऐ. १-१) से लेकर ‘एतया द्वारा प्रापद्यत’ (ऐतरे. ३-१२) तक कही गयी ईक्षण से लेकर प्रवेशपर्यन्त सृष्टि तो ईश्वर की बनाई हुई है। तस्य त्रय आवसथा (ऐत. ३-१२) से लेकर ‘स एतमेव ब्रह्म ततमपश्यत्’ (ऐतरे. ३-१३) तक वर्णन किये हुए जाग्रत् से लेकर मोक्षपर्यन्त संसार को जीव ने बना लिया है। इसका विशेष विस्तार तृप्ति- दीप के चतुर्थ श्लोक में है। अद्वितीयं ब्रह्मतत्त्व मसङ्गं तन्न जानते। जीवेशयो र्मायिकयो वृथैव कलहं ययुः ॥२१४॥ इस संसार में जो एक अद्वितीय तथा असंग ब्रह्मतत्त्व है उसको तो ये पहचानते ही नहीं हैं और फिर वृथा ही माया- कल्पित जीव तथा मायाकल्पित ईश्वर के विषय में परस्पर लड़े मरे जाते हैं। [इन किसी को भी श्रुतिसिद्ध परमार्थ तत्त्व का परिज्ञान नहीं हैं। ये तो ईश्वर को अपने से भिन्न राजा की तरह का एक शासक समझते हैं। विद्वान ज्ञानी नीतिनिपुण पुरुष उसी ईश्वर के कहने से प्रशंसनीय व्यवहार करता है। उसका ईश्वर उससे अच्छा व्यवहार कराता है। दूसरे प्रकार के पुरुष दूसरी तरह का बर्ताव करते हैं। उनका ईश्वर उनसे