पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 216, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१९६ पञ्चदशी
योग का बताया हुआ ईश्वर भी वैसा ही [ असंग चेतन और व्यापक ] है। ये ही तो 'तत्' और 'त्वं' के शुद्ध अर्थ हैं [ इस को तो आप भी मानते ही हो, फिर उन्हें पूर्वपक्ष क्यों बताते हो ] इसका उत्तर सुनो ॥२२१॥ तत् और त्वं के ये दोनों अर्थ हमारा सिद्धान्त नहीं है [ वे तो इन दोनों में वास्तव भेद मानते हैं। हमें वह भेद (तात्विक रूप से) स्वीकार ही नहीं है।] हमने जो कहीं कहीं भिन्न भिन्न 'तत्' 'त्वं' पदार्थों का निरूपण किया है, वह तो अद्वैत का ज्ञान कराने के लिये एक रीति सोची है। [ हमने सोचा है कि लोकप्रसिद्ध भेद को हटाकर, उन दोनों को एक बताने के लिये पहले उन दोनों को अलग अलग सम- झाया जाय, और पीछे से उन दोनों को एक कह दिया जाय। उन दोनों के भेद का प्रतिपादन करना तो हमें कदापि अभीष्ट नहीं है ]। अनादिमायया भ्रान्ता जीवेशौ सुविलक्षणौ । मन्यन्ते, तद्व्युदासाय केवलं शोधनं तयोः ॥२२३॥ अनादि अविद्या के प्रताप से जो पुरुष भ्रान्ति में फँसे हुए हैं, वे जीव और ईश्वर को अत्यन्त भिन्न चीज़ मानते हैं [ वे समझते हैं कि—कर्तृत्वआदि धर्म वाला तो जीव है, तथा सर्वज्ञता आदि गुणों वाला ईश्वर है। वे इन दोनों के धर्मों को पारमा- र्थिक ही मानते हैं। इस कारण इन दोनों को भी पृथक् पृथक् मानते हैं ] हमने तो इनके इस भ्रान्त विचार को हटाने के लिये ही उन दोनों ['तत्' 'त्वं'] का शोध किया है। अत एवात्र दृष्टान्तो योग्यः प्राक् सम्यगीरितः । घटाकाश-महाकाश-जलाकाशाभ्रखात्मकः ॥२२४॥