भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चित्रदीपप्रकरणम् १९७ क्योंकि हमें पदार्थ का शोध करना है इसी से घटाकाश, महाकाश, जलाकाश तथा अभ्राकाश का योग्य दृष्टान्त हमने पहले दिया था । [ इस दृष्टान्त में मूलतत्त्व एक ही है । उपाधिभेद से उसी के अनेक नाम हो गये हैं ] जलाभ्रोपाध्यधीने ते जलाकाशाभ्रखे, तयोः । आधारौ तु घटाकाशमहाकाशौ सुनिर्मलौ ॥२२५॥ जलाकाश तथा मेघाकाश दोनों ही जल तथा मेघरूपी उपा- धियों के अधीन होते हैं इसी से वे दोनों अपारमार्थिक भी हैं। किन्तु उन दोनों के आधार बने हुए जो घटाकाश और महा- काश हैं वे तो सुनिर्मल ही रहते हैं । [क्योंकि यदि जलादि उपाधियों की उपेक्षा कर दी जाय तो वे केवल आकाश ही आकाश तो हैं]। एवमानन्दविज्ञानमयौ मायाधियोर्वशौ । तदधिष्ठानकूटस्थब्रह्मणी तु सुनिर्मले ॥२२६॥ ठीक ऊपर के दृष्टान्त के अनुसार ही 'आनन्दमय' और 'विज्ञानमय' दोनों ही क्रम से 'माया' तथा 'बुद्धि' के वशवर्ती हैं । उनके अधिष्ठान कूटस्थ तथा ब्रह्म तो सुनिर्मल ही रहते हैं । एतत्कक्षोपयोगेन सांख्ययोगौ मतौ यदि । देहोऽन्नमयकक्षत्वा दात्मत्वेनाभ्युपेयताम् ॥२२७॥ इस कक्षा में कुछ उपयोगी होजाने से ही यदि सांख्य और योग के मत को मानोगे तो फिर अन्नमय कक्षा में उपयोगी होने से देह को भी आत्मा मानना पड़ जायगा । पुत्रादि आत्मा नहीं है इसका निश्चय कराने के लिए देह को भी आत्मा मानना उपयोगी हो जाता है, तो क्या देह को