भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चित्रदीपप्रकरणम् १९२ जीवित हैं [जब तक ये दोनों किसी को भास रहे हैं] तब तक आत्मा की असंगता का ज्ञान होना भी असंभव ही समझ लो [अद्वैत ज्ञान के विना असंगता का बोध हो ही नहीं सकता यह यहां गुप्त भाव है] अवश्यं प्रकृतिः सङ्गं पुरेवापादयेत् तथा । नियच्छत्येतमीशोऽपि कोऽस्य मोक्षस्तथा सति ॥२३१॥ [अपने आपको असंग समझ कर जो कृतकृत्य हो बैठा है] यह प्रकृति पहले की तरह [जैसे कि उसने पहले असंग में संग कर रक्खा था] फिर भी उसमें संग पैदा कर ही देगी । ईश्वर भी अपना शासन उस पर पूर्ववत् रखेंगे ही । फिर बताओ कि उस विचारे का यह मोक्ष ही क्या हुआ ? अविवेककृतः सङ्गो नियमश्चेति चेत् तदा । बलादापतितो मायावादः सांख्यस्य दुर्मतेः ॥२३२॥ सङ्ग और नियमन दोनों ही अविवेक से उत्पन्न हुआ करते हैं [फिर जब एक बार विवेक ज्ञान से अविवेक मर जायगा तब सङ्ग या नियमन की उत्पत्ति हो ही कैसे सकेगी ?] ऐसा यदि सांख्य कहता हो तब तो वह अविचारशील ज़बरदस्ती [न चाहने पर भी] मायावादी हो जाता है । [भाव यह है कि यदि उस अविवेक को अभावमात्र मानें, तब तो उससे भाव रूप कार्य की उत्पत्ति ही कैसे हो सकेगी ? यदि और किसी को संग का कारण मानें तो अविवेक को छोड़कर और कोई पदार्थ सङ्ग को उत्पन्न करने का कारण देखा ही नहीं गया । फिर जब उस अविवेक को भावरूप अज्ञान माना जायगा, तब इसी को तो मायावाद कहा जायगा ।]