पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें२०० पञ्चदशी बन्धमोक्षव्यवस्थार्थ मात्मनानात्वमिष्यताम् । इति चेन्न यतो माया व्यवस्थापयितुं क्षमा ॥२३३॥ अद्वैत को मानें तो यह प्रत्यक्ष दीखने वाली बन्धमोक्ष व्यवस्था नहीं बनती । इस बन्धमोक्ष व्यवस्था को बनाने के लिये आत्माओं को नाना मान लेना चाहिये, यह कथन ठीक नहीं । क्योंकि आत्मा तो एक ही है । तुम्हारी इस बन्धमोक्षव्यवस्था को तो माया ही व्यवस्थित कर सकती है [ इतने से काम के लिये आत्मभेद मान लेना ठीक नहीं है । ] ‘दुर्धटं घटयामीति’ विरुद्धं किं न पश्यसि ! वास्तवौ बन्धमोक्षौ तु श्रुतिर्न सहतेतराम् ॥२३४॥ क्या तुमने माया की विरुद्ध भाषा ( बोली ) नहीं सुनी है ? वह कहती है कि जो बात दुर्घट है [ हो नहीं सकती है ] उसे ही मैं कर सकती हूँ । विचार कर देख लो कि सच्चे बन्ध या सच्चे मोक्ष को तो श्रुति सहती ही नहीं [ अनादेरन्तवत्वं च संसारस्य न सेत्स्यति । अनन्तता चादिमतो मोक्षस्य न भविष्यति । यदि इस संसार को अनादि मानलें तो फिर इसका अन्त कभी नहीं होगा । यदि मोक्ष को प्रारम्भ होने वाला मान लें तो फिर यह अनन्त भी नहीं हो सकेगा। यही कारण है कि श्रुति सच्चे बन्धमोक्ष नहीं मानती । वह तो कहती है कि— ] न निरोधो न चोत्पत्ति र्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षु र्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥२३५॥ न कभी आत्मा का नाश होता है । न यह आत्मा कभी देह के सम्बन्ध में आता है । न इसे कभी सुख दुःख होते हैं । न यह कभी श्रवणादि साधनों का अभ्यास करता है । न इसमें कभी