पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०४ पंचदशी कहेंगे कि ऐसे तो सम्पूर्ण द्वैत का भान भी किसी को नहीं होता है [यों यह दोष दोनों पक्षों में समान ही है] दिङ्मात्रेण विभानं तु द्वयोरपि समं खलु । द्वैतसिद्धिर्यदद्वैतसिद्धिस्ते तावता न किम् ॥२४३॥ एक देश का भान हो जाना तो द्वैत और अद्वैत दोनों पक्षों में समान ही है। द्वैत के किसी एक देश को देखकर जैसे तुम सम्पूर्ण द्वैत को सिद्ध कर लेते हो [उस पर विश्वास कर लेते हो] इसी प्रकार अद्वैत के एक देश को जानकर अद्वैत का निश्चय तुम्हें क्यों नहीं होता है सो हमें भी बताओ ? द्वैतेन हीन मद्वैतं, द्वैतज्ञाने कथं त्विदम् । चिद्भानं त्वविरोध्यस्य द्वैतस्यातोऽसमे उभे ॥२४४॥ पूर्वपक्षी कहता है कि, द्वैत से जो हीन हो वही तो 'अद्वैत' है । सो भाई, जब तक द्वैत का ज्ञान बना हुआ है तब तक अद्वैत ठहरेगा ही कैसे यह हमें बताओ ? [२४२ श्लोक में तुम कह चुके हो कि चिद्रूप से अद्वैततत्व का भास हो रहा है सो तुम्हारा वह] चिद्भान तो इस द्वैत का विरोध करता ही नहीं । इस कारण तुम हमारी तरह यह नहीं कह सकते हो कि अद्वैत का विरोधी होने से अद्वैत के रहते रहते द्वैत की सिद्धि कैसे हो जायगी । एवं तर्हि शृणु द्वैतमसन् मायामयत्वतः । तेन वास्तवमद्वैतं परिशेषाद् विभासते ॥२४५॥ सिद्धान्ती इसका उत्तर यों देता है—हम जो द्वैत को असत् बताते हैं उसका कारण भी हम से सुन लो—हमारा कहना है कि मायामय होने के कारण यह द्वैत असत् है । जब इस प्रकार द्वैत का निषेध कर डाला जाता है तब परिशेष से वास्तव अद्वैत ही