भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चित्रदीपप्रकरणम् २०५

ज्ञानी को भासने लगता है । [प्राप्त हुए सभी पदार्थों का निषेध करते जाने पर जहां हमारा निषेध लागू न हो सकता हो उसका सत्यत्व निश्चय कर लेना ‘परिशेष’ है। अचिन्त्यरचनारूपं मायैव सकलं जगत् । इति निश्चित्य वस्तुत्वमद्वैते परिशेष्यताम् ॥२४६॥ इस जगत् की न तो रचना ही समझ में आती है और न इसका कुछ रूप ही ध्यान पर चढ़ता है यों ‘अचिन्त्यरचना’ और ‘अचिन्त्यरूप’ वाला होने से यह सम्पूर्ण जगत् ‘माया’ किंवा ‘मिथ्या’ ही है । इस प्रकार अनिर्वचनीय होने के कारण द्वैत के मिथ्यात्व का निश्चय करके, परिशेष से अद्वैत को ही वास्तव समझ लेना चाहिये । पुनर्द्वैतस्य वस्तुत्वं भाति चेत् त्वं तथा पुनः । परिशीलय कोवात्र प्रयासस्तेन ते वद ॥२४७॥ यदि तो पूर्ववासनाओं की प्रबलता से फिर फिर द्वैत की सत्यता का भान तुम्हें होता हो तो, तुम्हें चाहिये कि तुम फिर फिर विचार किया करो । बताओ कि विचार करने में तुम्हें कौन सी मेहनत पड़ेगी ? [यही बात ‘आवृत्तिरसकृदुपदेशात्’ इस सूत्र में वेदान्त दर्शन के चतुर्थ अध्याय में कही गयी है कि आत्मा के श्रवणादि की आवृत्ति करते रहना चाहिये। क्योंकि अनादि काल की द्वैतवासनायें साधक पर लौट लौट कर हमला करेंगी। अपना पूर्वाधिकार पाने के लिये जी तोड़ कोशिश करेंगी। इस लिये भुलावे से बचने के लिये साधक को विवेक को दुहराते रहना चाहिये ] ।