पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०६ पञ्चदशी कियन्तं कालमिति चेत् खेदोऽयं द्वैत इष्यताम् । अद्वैते तु न युक्तोऽयं सर्वानर्थनिवारणात् ॥२४८॥ 'विचार कब तक करें' यह खेद तो द्वैत में ही हो सकता है, सम्पूर्ण अनर्थों का निवारण हो जाने से अद्वैत में तो यह खेद युक्त ही नहीं है । यदि पूछो कि फिर कितने समय तक इस प्रकार विचार करते चलें तो उसका उत्तर यह है कि—प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त हो जाने पर यह विचार स्वयमेव समाप्त हो जाता है, यह बात इसी प्रकरण के पन्द्रहवें श्लोक में कही जा चुकी है । विचार करते जाने का अनन्त खेद तो द्वैतवाद में ही हो सकता है। आत्म- दर्शन हो जाने पर सम्पूर्ण अनर्थों के भाग जाने से, अद्वैत में तो यह खेद करना, किंवा अपने सामने एक अनन्त काम पड़ा हुआ देखना, युक्त ही नहीं है । जब अद्वैत का पूर्ण साक्षात्कार होगा तब विचार अपने आप छूट जायगा । विचार का अपने आप छूट जाना, पेट भरी हुई जोक (जलौका) की तरह गिर पड़ना, ही अद्वैत प्राप्ति की सूचना है । क्षुत्पिपासादयो दृष्टा यथापूर्वं मयीति चेत् । मच्छब्दवाच्येऽहंकारे दृश्यतां नेति को वदेत् ॥२४९॥ अद्वैत को समझ लेने पर अब भी पहले ही की तरह मैं तो अपने में उन्हीं पहले की भूख प्यासों को देख रहा हूँ । फिर आत्मज्ञान को सम्पूर्ण अनर्थों को भगा देने वाला कैसे मान लूँ ? ऐसा यदि कहा जाय तो उसका उत्तर यह है कि [मैं के दो अर्थ होते हैं एक 'अहंकार' दूसरा 'चिदात्मा' । सो भाई असंग और अविषय होने के कारण चिदात्मा को तो भूख प्यास लगती