पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् २०७ ही नहीं।] ये भूख प्यास आदि तो मैं के अहंकार रूपी (दूसरे) अर्थ में ही पायी जाती हैं। भूख प्यास लगने को तो कोई भी मना नहीं करता है। [हमारा कहना तो केवल इतना ही है कि— चिदात्मतत्व को भूख प्यास नहीं लगतीं, अहंकार को लगती हैं] चिप्द्रेऽपि प्रसज्येरंस्तादात्म्याध्यासतो यदि । माध्यासं कुरु किन्तु त्वं विवेकं कुरु सर्वदा ॥२५०॥ यदि [कहा जाय कि चिदात्मा में भूख प्यास वस्तुतः न होती हों तो न हों किन्तु] तादात्म्याध्यास किंवा भ्रम से तो चिदात्मा में भी यदि भूख प्यास लगने लगें तो हम क्या करें ? इसका उत्तर यह है कि [इस बात को पहचानने के बाद तुम यह करो कि] अनर्थ की जड़ इस अध्यास को करना ही छोड़ दो और अध्यास को निवृत्त करने के लिये सदा ही विवेक करते रहा करो। झटित्यध्यास आयाति दृढवासनयेति चेत् । आवर्तयेद् विवेकं च दृढं वासयितुं सदा ॥२५१॥ यदि तो अनादि दृढ वासनाओं की प्रबलता से यह गया हुआ भी अध्यास वार बार लौट कर आता हो तो, उसको निवृत्त करने के लिये विवेक की आवृत्ति ही करनी चाहिये। जिससे कि विवेक की वासनायें दृढ हो जांय [इसके अतिरिक्त अध्यास को हटाने का अन्य कोई भी उपाय नहीं है। जैसे अध्यास ने हमारे हृदय में जड़ पकड़ ली हैं इसी तरह विवेक को बद्धमूल करने के लिये—अध्यास की जगह विवेक को दे देने के लिये—विवेक की अनन्त आवृत्तियें करनी पड़ेंगी]। विवेके द्वैतमिथ्यात्वं युक्त्यैवेति न भण्यताम् । अचिन्त्यरचनात्वस्यानुभूतिर्हि स्वसाक्षिकी ॥२५२॥