भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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विचार करने पर द्वैत का मिथ्यापन तो केवल युक्ति से ही सिद्ध होता है। अनुभव से द्वैत का मिथ्यापन सिद्ध नहीं होता ऐसा कभी भी न कहना चाहिये। क्योंकि इस द्वैत के अचिन्त्य रचनापने का किंवा मिथ्यापने का जो अनुभव होता है उसका साक्षी तो अपना आत्मा ही है [इस द्वैत की रचना का चिन्तन भी नहीं हो सकता यह तो प्रत्येक का अनुभव कह ही रहा है]। चिदप्यचिन्त्यरचना यदि तर्ह्यस्तु नो वयम् । चितिं सुचिन्त्यरचनां ब्रूमो नित्यत्वकारणात् ॥२५३॥ यदि यह कहा जाय कि ऐसे तो चिदात्मा की रचना भी अचिन्त्य ही है फिर बताओ कि वह मिथ्या क्यों नहीं होता ? तो हम कहेंगे कि आत्मा अचिन्त्यरचना वाला है तो हुआ करो। हम तो उसको नित्य होने के कारण सुचिन्त्य रचना वाला कभी नहीं कहते । [नित्यपदार्थों की रचना होती ही नहीं इसी कारण उनको भी अचिन्त्यरचना वाला माना जाता है]। प्रागभावो नानुभूतश्चितेर्नित्या ततश्चितिः । द्वैतस्य प्रागभावस्तु चैतन्येनानुभूयते ॥२५४॥ चिति के नित्य होने का कारण तो यह है कि—इसके प्राग- भाव को किसी ने आज तक अनुभव किया ही नहीं। उस द्वैत के प्रागभाव को तो यह चैतन्य ही अनुभव किया करता है। [देखते हैं कि जाग्रदादि द्वैत के अभाव को सुषुप्ति के समय यह साक्षी चैतन्य ही अनुभव करता है]। प्रागभावयुतं द्वैतं रच्यते हि घटादिवत् । तथापि रचनाऽचिन्त्या मिथ्या तेनेन्द्रजालवत् ॥२५५॥ प्रागभाव से युक्त होने के कारण, यह द्वैत, घटादि के समान