भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चित्रदीपप्रकरणम् २०९ ही, रचा तो जाता है, परन्तु इसकी रचना अचिन्त्य ही है [इसकी रचना किसी की समझ में आने वाली नहीं है। कोई भी यथार्थ रूप से इसकी रचना को जान नहीं सका है] इससे यही कहना पड़ता है कि यह इन्द्रजाल के समान मिथ्या ही है [जो चीज़ रची तो जाय पर उसकी रचना अचिन्त्य हो, उसे 'मिथ्या' कहा जाता है। यह मिथ्या का लक्षण द्वैत में मिलता है, इससे द्वैत का मिथ्यापन सिद्ध हो चुका ] । चित्प्रत्यक्षा ततोऽन्यस्य मिथ्यात्वं चानुभूयते । नाद्वैतमपरोक्षं चेत्येतन्न व्याहतं कथम् ॥२५६॥ [स्वप्रकाश होने के कारण] चिति तो नित्य ही प्रत्यक्ष प्रतीत हो रही है। उस चिति से भिन्न जो भी कुछ है,उस सब के मिथ्या- भाव को भी वही चिति अनुभव कर रही है। यह बात यहां तक सिद्ध की जा चुकी। इतने पर भी जब कोई यह कह बैठे कि हमें तो अद्वैत का अपरोक्ष [प्रत्यक्ष] नहीं होता है तो उसके इस कथन में व्याघात दोष क्यों नहीं है ? [इसी प्रकरण के २४२ श्लोक में अद्वैत के प्रत्यक्ष होने की बात भले प्रकार समझा दी है इस कारण अद्वैत का प्रत्यक्ष न होना विरुद्ध बात है। जो अद्वैत होगा वह तो प्रत्यक्ष होगा ही ] । इत्थं ज्ञात्वाप्यसन्तुष्टाः केचित् कुत इतीर्यताम् । चार्वाकादेः प्रबुद्धस्याप्यात्मा देहः कुतो वद ॥२५७॥ वेदान्त की बतायी इस महावार्ता को जान कर भी, बहुत से लोग इससे सन्तुष्ट क्यों नहीं हैं ? [उन्हें इस पर विश्वास क्यों नहीं होता है ? ] यह जब हम से पूछा जायगा तब हम कहेंगे कि-तुम यह बताओ कि ऊहापोह करने में परम प्रवीण