पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१० पञ्चदशी समझदार] चार्वाक आदि लोग भला देह को ही आत्मा क्योंकर मानते हैं? [भाव यह है कि जिन लोगों को मताध्यास हो जाता है वे दूसरे की उचित बात को भी अपने हृदयमन्दिर में घुसने नहीं देते हैं] । सम्यग्विचारो नास्त्यस्य धीदोषादिति चेत् तथा । असन्तुष्टास्तु शास्त्रार्थं न त्वैक्षन्त विशेषतः ॥२५८॥ यदि कहा जाय कि 'इस चार्वाक ने तो धीदोष के कारण भले प्रकार विचार ही नहीं किया है तो हम कहेंगे कि बुद्धिदोष के कारण ही जो लोग असन्तुष्ट हैं उन्होंने कभी वेदान्त की गुह्य बात का गम्भीर विचार ही नहीं किया है । [वे ऊपर ऊपर इसे सुनकर हंसी में टाल जाते हैं। नहीं तो बताओ कि सारे संसार का प्रत्यक्ष तो हमें हो, परन्तु अपने आपे का हमें प्रत्यक्ष न हो-- अपना आपा हमें परोक्ष बना रहे—संसार में इससे बड़ी मूर्खता और इससे बड़ा अपराध और कोई हो सकता है ?] यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । इति श्रौतं फलं दृष्टं नेति चेद् दृष्टमेव तत् ॥२५९॥ इस मुमुक्षु के हृदय में जो काम अथवा इच्छादि घुसे बैठे हैं, वे सब के सब जब [मुमुक्षु के हृदय में से] निकल कर भाग जाते हैं-[तत्व ज्ञान के प्रभाव से अध्यास के निवृत्त होते ही जब वे सब निवृत्त हो जाते हैं] तो फिर अचम्भे की बात देखो कि- देह के साथ तादात्म्याध्यास करके बार बार मर मिटने वाला ही यह पुरुष तुरन्त ही अमर पद को पा जाता है [क्योंकि वह तो इस हाड मांस के देह में ही सत्यादि स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। तत्व ज्ञान का ऐसा ही श्रौत महाफल देखा जाता है।]