पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 231, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् २११ फिर भी यदि यह कहा जाय कि यह कामनिवृत्ति आदि महाफल श्रुति ने कह ही कह दिया है, परन्तु ऐसा कहीं देखा नहीं जाता है तो हम फिर प्रबल शब्दों में कहेंगे कि ऐसा फल देखा भी गया है। [आज कल भी बहुत से ऐसे योगी महात्मा हैं कि जिनका ग्रन्थिभेद हो चुका है, वे अमर हो चुके हैं और यहीं अमर पद को पा चुके हैं ] यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयग्रन्थयस्त्विति । कामा ग्रन्थिस्वरूपेण व्याख्याता वाक्यशेषतः ॥२६०॥ यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते (कठ० ६-१५) इस वाक्य में कामनाओं को ही ग्रन्थिरूप कहा गया है। इस वाक्य में कामनाओं से छुट- कारे को ही ग्रन्थिभेद बताया है [अहंकार और चिदात्मा का तादात्म्याध्यास जब निवृत्त हो जाता है तब उसी को 'ग्रन्थिभेद' कहते हैं। वह ग्रन्थिभेद तो हो जाय और किसी को उसका प्रत्यक्ष न हो यह कैसे सम्भव हो सकता है ? इसी से कहा था कि कामनिवृत्ति रूपी फल देखा भी गया है यह केवल पुस्तकों में लिखने की ही बात नहीं है। ] अहंकारचिदात्मानावेकीकृत्याविवेकतः । इदं मे स्यादिदं मे स्यादितीच्छाः कामशब्दिताः॥२६१॥ अहंकार और चिदात्मा को, अपने अज्ञान से, एक बना कर, ऐसी आशा करने लगना कि 'यह भी मुझे मिले' और 'वह भी मुझे मिले' बस यही इच्छायें 'काम' कहाती हैं। अप्रवेश्य चिदात्मानं पृथक् पश्यन्नहंकृतिम् । इच्छंस्तु कोटिवस्तूनि न बाधो ग्रन्थिभेदतः ॥२६२॥ चिदात्मा को तो उसमें प्रविष्ट न किया जाय और अहंकार