पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् २१७ इन [वैराग्य बोध तथा उपरम] तीनों के कारण, स्वरूप, तथा कार्य भिन्न भिन्न हैं । इससे ये तीनों एक नहीं हैं । शास्त्रार्थ का विवेक करने वाले लोगों को इनका भेद ठीक ठीक रीति से समझ लेना चाहिये । दोषदृष्टि र्जिहासा च पुनर्भोगेष्वदीनता । असाधारणहेत्वाद्या वैराग्यस्य त्रयोऽप्यमी ॥२७८॥ विषयों में दोषदृष्टि, वैराग्य का मुख्य कारण होता है । विषयों को छोड़ने की अभिलाषा, वैराग्य का 'स्वरूप' कहाता है । भोगों के प्रति दीनता का न रहना, वैराग्य का 'फल' माना जाता है । श्रवणादित्रयं तद्वत् तत्वमिथ्याविवेचनम् । पुनर्ग्रन्थेरनुदयो बोधस्यैते त्रयो मताः ॥२७९॥ श्रवण मनन तथा निदिध्यासन, ये तीनों बोध के मुख्य 'कारण' हैं। सत्य और मिथ्या का विवेक, बोध का 'स्वरूप' होता है । ग्रन्थि का फिर कभी भी उदय न होना, बोध का 'कार्य' बताया जाता है । यमादिर्धीनिरोधश्च व्यवहारस्य संक्षयः । स्युर्हेत्वाद्या उपरते रित्यसंकर ईरितः ॥२८०॥ उपरति के मुख्य 'कारण' यम नियमादि हैं। बुद्धि का निरोध हो जाना, उपरति का 'स्वरूप' है । व्यवहार का समाप्त हो जाना, उपरति का 'फल' माना गया है । यों इन तीनों के भेद का वर्णन किया गया । तत्त्वबोधः प्रधानं स्यात् साक्षान्मोक्षप्रदत्वतः । बोधोपकारिणावेतौ वैराग्योपरमावुभौ ॥२८१॥