पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१८ पञ्चदशी [तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वे० ३--८) इस श्रुति के आधार से कहते हैं कि--इन तीनों में] तत्वबोध ही प्रधान है । क्योंकि यही साक्षात् मोक्ष का देने वाला है । वैराग्य तथा उपरति ये दोनों तो इसी तत्ववोध [ज्ञान] के सहायक होते हैं । त्रयोप्यत्यन्तपक्काश्चेन्महत् स्तपसः फलम् । दुरितेन क्वचित् किंचित् कदाचित् प्रतिबध्यते ॥२८२॥ यदि ये तीनों अत्यन्त पक्के हो जायँ तो यह मामूली पुण्यों का फल नहीं है । [क्योंकि जब करोड़ों जन्मों में कमाये हुए पुण्यों का परिपाक होता है तब कहीं ये तीनों इकट्ठे हो पाते हैं। नहीं तो] प्रतिबन्ध करने वाले पाप के प्रभाव से किसी पुरुष में किसी काल में इन तीनों में से एक आध का प्रतिबन्ध हो जाता है । वैराग्योपरती पूर्णे बोधस्तु प्रतिबध्यत । यस्य तस्य न मोक्षोस्ति पुण्यलोकस्तपोबलात् ॥२८३॥ वैराग्य और उपरति तो पूर्ण हो चुके हों और आत्मबोध न हुआ हो तो उस विचारे तपस्वी को मोक्ष नहीं मिलेगा । उस को तो उस के तपोबल से किसी पुण्यलोक की प्राप्ति हो जायगी [भाव यही हुआ कि--तत्वज्ञान के न होने पर मोक्ष का मिलना असम्भव ही है ।] पूर्णे बोधे तदन्यौ द्वौ प्रतिबद्धौ यदा तदा । मोक्षो विनिश्चितः किन्तु दृष्टदुःखं न नश्यति ॥२८४॥ यदि किसी का ज्ञान तो पूर्ण हो चुका हो और वैराग्य तथा उपरति उसे न हो गये हों, तो मोक्ष तो उसे मिलेगा ही,