भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 243

[Header] तृप्तिदीपप्रकरणम् २२३ संकल्प किया] प्रवेश तक [कि इस जीव रूप से इसी सृष्टि में प्रवेश कर जाऊँ] की सब सृष्टि तो ईश्वर की बनायी हुई है । जाग्रत् से लेकर मोक्षपर्यन्त सब संसार जीव का बनाया हुआ है । [क्योंकि वही अपने आप को जागता हुआ या मुक्त होता हुआ माना करता है । वह इसमें अभिमान रखता है । यदि यह जीव साधना करके इन सब अवस्थाओं में से अपना अभि- मान हटा ले तो जाग्रदादि संसार का एकपदे ध्वंस हो जाय । जाग्रदादि संसार का वर्णन तो यों है कि—यह प्राणी माया से मोहित होकर इस मांस के झोंपड़े में अहम्भाव से निवास कर लेता है तो फिर भले बुरे सभी काम करने लगता है । यह जाग्रत् काल में अन्न पान आदि नाना भोगों से अपनी तृप्ति होना मानता है। स्वप्न में यह अपनी माया से ही सम्पूर्ण लोक को बनाता है और अपने बनाये हुए उसी से सुख दुःख भोगा करता है । सुषुप्तिकाल में जब सब कुछ विलीन हो जाता है, जब अज्ञान से अभिभूत हो जाता है, तब सुखरूप हुआ रहता है । यह तो एक शरीर की जाग्रत् आदि अवस्थायें हुईं । जब एक शरीर में निवास के कर्म समाप्त हो जाते हैं और जन्मान्तर देनेवाले कर्मों की बारी आ जाती है तब वही जीव फिर जन्म लेता है और फिर यों ही जागता है, सपने देखता है और सोया करता है । यों यह जीव इन जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं और स्थूल, सूक्ष्म आदि तीनों शरीरों में खेल से करता फिरा करता है । उसी जीव के कर्मों के प्रताप से यह सब विचित्र जगत् उत्पन्न हो गया है । जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति आदि के इस प्रपंच को जो तत्व प्रकाशित कर रहा है, वही ब्रह्म नाम का तत्व मैं हूँ,