भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 244

२२४ पञ्चदशी ऐसा यदि किसी को मालूम हो जाय, तो उसका बन्धनों से छुटकारा हो जाय, उसका कल्पित संसार विलीन हो जाय ।] भ्रमाधिष्ठानभूतात्मा कूटस्थासंगचिद्वपुः । अन्योन्याध्यासतोऽसङ्गधीस्थजीवोऽत्र पूरुषः ॥५॥ यद्यपि यह कूटस्थ [अविकारी] असङ्ग और चित्स्वरूप ही है। तथापि देहेन्द्रिय आदि के अध्यास रूपी भ्रम का आधार भी बना हुआ है। वह असङ्ग आत्मतत्व ही अन्योन्याध्यास की पकड़ में आकर जब परमार्थदृष्टि से [ उससे ] सदा असम्बद्ध रहने वाली बुद्धि में ठहर कर 'जीव' बन जाता है, तब ऐसे उस जीव को ही इस श्रुति में 'पूरुष' अथवा 'पुरुष' कहा गया है । साधिष्ठानो विमोक्षादौ जीवोऽधिक्रियते, न तु । केवलो, निरधिष्ठानविभ्रान्तेः क्वाप्यसिद्धितः ॥६॥ [ जीव शब्द के अर्थ में से हम अधिष्ठानभूत कूटस्थ चैतन्य को नहीं छोड़ सकते हैं । बुद्धि आदि की कल्पना का अधिष्ठान कूटस्थ चैतन्य ही, जब बुद्धि में प्रतिबिम्बित हो जाता है, तब उसे हम 'जीव' कहते हैं। केवल चिदाभास को हम जीव नहीं कहते। क्योंकि] अधिष्ठान अर्थात् कूटस्थ चैतन्य के सहित ही यह जीव मोक्ष या स्वर्गादि के साधनों का अनुष्ठान करने का अधिकारी होता है। केवल चिदाभास को मोक्षादि का अधिकार ही नहीं है। क्योंकि बिना अधि- ष्ठान की भ्रान्ति [ आरोप्य पदार्थ ] लोक में कहीं भी देखी नहीं जाती [ इस कारण जीव शब्द के अर्थ में हमें कूटस्थ चैतन्य को रखना ही पड़ता है। यदि हम कूटस्थ तत्व को नहीं