भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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[Page Header] २२६ पञ्चदशी

[Main Text] क्यों कर जान सकता है कि 'मैं असङ्ग हूँ' ? इसका समाधान भी सुनो कि—अहं के तीन अर्थ हैं—एक मुख्य अर्थ है, तथा दो उसके अमुख्य अर्थ होते हैं। [भाव यह है कि मुख्यरूप से तो अहं प्रतीति का विषय आत्मा हो ही नहीं सकता, परन्तु लक्षणा से उसको 'अहं' कहा ही जा सकता है।] अन्योन्याध्यासरूपेण कूटस्थाभासयोर्वपुः । एकीभूय भवेन्मुख्यस्तत्र मूढैः प्रयुज्यते ॥१०॥ कूटस्थ और आभास इन दोनों का स्वरूप अन्योन्याध्यास की आँच में पिघल कर जब एकता को प्राप्त कर लेता है तब बस यही अहं शब्द का 'मुख्य अर्थ' कहाता है। [इसको इस अहं का मुख्य अर्थ इसी लिये कहते हैं कि कूटस्थ और चिदा- भास के इसी हिले मिले स्वरूप का जिनको विवेक नहीं है वे सभी ] मूढ लोग अहं शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया करते हैं। [अधिक संख्या इसी अर्थ में अहं शब्द का प्रयोग करने वालों की है। इसलिये इसे ही मुख्य मान लिया है] पृथगाभासकूटस्था वमुख्यौ तत्र तत्ववित् । पर्यायेण प्रयुङ्क्तेऽहंशब्दं लोके च वैदिके ॥११॥ जब तो यह समझ लिया जाय कि आभास अलग है और कूटस्थ तत्व अलग है, तब [ अलगाये हुए ] वे दोनों अहं के अमुख्य अर्थ हो जाते हैं। क्योंकि तत्वज्ञानी लोग लौकिक और वैदिक व्यवहारों में कभी तो कूटस्थ को अहं कहते हैं और कभी अकेले चिदाभास को अहं कह देते हैं। [भाव यह है कि—क्योंकि कूटस्थ और चिदाभास का जो मिश्रित रूप है वही सार्वजनीन व्यवहार का विषय हो रहा है। इससे उसे तो