पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page Header: तृप्तिदीपप्रकरणम् २२७]
अहं का मुख्य अर्थ मान लिया है। इन दोनों के विविक्त रूपों का व्यवहार तो बहुत थोड़े से मनुष्य (सो भी कभी ही) करते हैं, इससे उनको अमुख्य अर्थ कहा जाता है।] लौकिकव्यवहारेऽहंगच्छामीत्यादिके बुधः । विविच्यैव चिदाभासं कूटस्थात्तं विवक्षति ॥१२॥ ज्ञानी पुरुष जब लौकिक व्यवहार में 'मैं जाता हूँ' ऐसा बोलता है तब वह चिदाभास को कूटस्थतत्व से पृथक् करके ही उस चिदाभास को 'अहं' नाम से कहना चाहता है। [ज्ञानी पुरुष जब 'मैं जाता हूँ' ऐसा कहता है तब वह यह कभी नहीं भूलता कि कूटस्थ आत्मतत्व जाने वाला पदार्थ नहीं है। उसे यह सदा स्मरण रहता है कि यह चिदाभास ही जाता आता है ] असङ्गोऽहं चिदात्माहमिति शास्त्रीयदृष्टितः । अहंशब्दं प्रयुङ्क्तेऽयं कूटस्थे केवले बुधः ॥१३॥ वही ज्ञानी पुरुष शास्त्रीय दृष्टि को लेकर कभी कभी चिदा- भास से हीन केवल कूटस्थ तत्व में भी 'अहं' शब्द का प्रयोग किया करता है कि 'मैं असङ्ग हूँ' 'मैं चिदात्मा हूँ'। [यों मुख्य तया न सही परन्तु लक्षणा से तो चिदात्मा भी अहं शब्द का अर्थ हो ही जाता है। इसी कारण 'मैं असङ्ग हूँ' यह ज्ञान भी ठीक हो जाता है।] ज्ञानिताज्ञानिते त्वात्माभासस्यैव न चात्मनः । तथा च कथमाभासः कूटस्थोऽस्मीति बुध्यताम् ॥१४॥ ज्ञानित्व और अज्ञानित्व दोनों आत्माभास को ही होते हैं। असङ्ग चिद्रूप आत्मा में न तो ज्ञानता ही हो सकती है और