भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

२३६ पञ्चदशी विक्षेपोत्पत्तितः पूर्वमपि विक्षेपसंस्कृतिः । अस्त्येव तदवस्थात्वमविरुद्धं ततस्तयोः ॥३९॥ जब तक विक्षेप उत्पन्न नहीं हुआ था, तब भी विक्षेप के [ उत्पादक ] संस्कार तो थे ही, इस कारण से 'अज्ञान' और 'आवरण' दोनों को विक्षेप की अवस्था कहने में कोई विरोध नहीं रह जाता । ब्रह्मण्यरारोपितत्वेन ब्रह्मावस्थे इमे इति । न शङ्कनीयं, सर्वासां ब्रह्मण्येवाधिरोपणात् ॥४०॥ [अज्ञात रहने वाले संस्कारों के सहारे से, इन दोनों को विक्षेप की अवस्था कहने से तो यही अच्छा है कि ] ब्रह्म में आरोपित होने से इन दोनों को ब्रह्म की ही अवस्था मान लिया जाय, ऐसी शंका न करनी चाहिए । क्योंकि यों तो सारी ही अवस्थाएं ब्रह्म में आरोपित हैं [ फिर तो सभी को ब्रह्म की अवस्था कह देना होगा ] । संसार्यहं विबुद्धोहं निःशोकस्तुष्ट इत्यपि । जीवगा उत्तरावस्था भान्ति न ब्रह्मगा यदि ॥४१॥ तर्ह्यज्ञोहं ब्रह्मसत्वभाने मद्दृष्टितो नहि । इति पूर्वे अवस्थे च भासेते जीवगे खलु ॥४२॥ मैं संसारी [ कर्तृत्व आदि धर्म वाला ] हूँ, मैं विबुद्ध हूँ अर्थात् मुझे तत्व का साक्षात्कार हो चुका है, अब मुझे शोक नहीं रहा, मैं अब पूर्ण तुष्ट हो चुका हूँ, ये पिछली चारों अव- स्थाएं तो स्पष्ट ही जीव के आश्रित प्रतीत हो रही हैं,इस कारण हम इन चारों को ब्रह्माश्चित नहीं कहते हैं । किन्तु विक्षेप से