पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृप्तिदीपप्रकरणम् २३७ पहली उन दो अवस्थाओं को (अज्ञान और आवरण को) ही ब्रह्माश्चित कहते हैं, ऐसी शंका यदि कोई करे तो उससे कहो कि तब तो पहली दोनों (अज्ञान और आवरण नाम की) अवस्थाएं भी जीव के आश्रित ही प्रतीत होती हैं, इसलिए वे जीव की ही अवस्थाएं हैं, तभी तो कहा जाता है कि मैं अज्ञ हूँ, ब्रह्म की सत्ता और ब्रह्म का भान मेरे अनुभव में आता ही नहीं। अज्ञानस्याश्रयो ब्रह्मेत्यधिष्ठानतया जगुः। जीवावस्थात्वमज्ञानाभिमानित्वादवादिषम् ॥४३॥ पूर्वाचार्यों ने जो ब्रह्म को अज्ञान का आश्रय कहा है,उनका तात्पर्य उसे अधिष्ठान बताने में ही है। हमने तो अज्ञान का अभिमानी होने से उस (अज्ञान) को जीव की अवस्था कह दिया था। ज्ञानद्वयेन नष्टेऽस्मिन्नज्ञाने तत्कृतावृत्तिः। न भाति नास्ति चेत्येषा द्विविधापि विनश्यति ॥४४॥ परोक्षज्ञान और अपरोक्षज्ञान के द्वारा जब यह आवरण करने वाला अज्ञान नष्ट हो जाता है,तब उस अज्ञान का उत्पन्न किया हुआ दोनों ही प्रकार का आवरण* 'कि वह नहीं है और प्रतीत भी नहीं होता है' विनष्ट हो जाता है [क्योंकि उसका कारण ही नहीं रहता। यों परोक्षज्ञान और अपरोक्षज्ञान नाम की दोनों अवस्थाएं अज्ञान और आवरण को हटा कर मुक्ति का कारण हो जाती हैं]। *आवरण दो प्रकार का होता है एक असत्वापादक [नहीं है कहलाने वाला] कि वह है.ही नहीं, दूसरा अभानापादक [प्रतीत नहीं होता कहलाने वाला] कि वह मुझे प्रतीत नहीं होता।