पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३८ पञ्चदशी परोक्षज्ञानतो नश्येदसत्वावृतिहेतुता । अपरोक्षज्ञाननाश्या ह्यभानावृतिहेतुता ॥४५॥ ['कूटस्थ है' ऐसा] परोक्षज्ञान जब हो जाता है, तब अज्ञान की असत्वावरण शक्ति नष्ट हो जाती है [फिर वह साधक 'ब्रह्म नहीं है' ऐसा कभी नहीं कहता] जब तो [मैं ही कूटस्थ हूँ' ऐसा] प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है फिर [कूटस्थ की प्रतीति मुझे नहीं होती ऐसा] अभानावरण भी भाग जाता है । [असत्वावरण अनुभवीगुरु के समझाने से जाता है,अभानावरण अपने प्रयत्न से साक्षात् होने पर हटाया जाता है ] । अभानावर्णे नष्टे जीवत्वारोपसंक्षयात् । कर्तृत्वाद्यखिलः शोकः संसाराख्यो निवर्तते ॥४६॥ [पिछली दोनों अवस्थायें ज्ञान का फल हैं । अब उन में से पहली शोकनिवृत्ति नाम की अवस्था को कहा जाता है कि] अभानावरण जब निवृत्त हो जाता है तब भ्रान्ति से प्रतीत होने वाला जीवत्व भी नहीं रहता और फिर तो [जीव भाव के कारण बना हुआ] कर्ता भोक्ता रूपी संसार नाम का सभी शोक भाग जाता है । निवृत्ते सर्वसंसारे नित्यमुक्तत्वभासनात् । निरङ्कुशा भवेत् तृप्तिः पुनः शोकासमुद्भवात् ॥४७॥ जब [कर्तृत्व आदि रूप वाला] सब संसार नहीं रहता तब [मेघों के हट जाने से सूर्य का भास जैसे हो जाता है उसी तरह] आत्मा के नित्यमुक्तपने का भास होने लगता है । फिर तो निर्मर्याद तृप्ति हो जाती है । क्योंकि फिर कभी शोक की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती ।