भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तत्त्वविवेकप्रकरणम् ९ है। इसी प्रकार आनन्द का सामान्यतया भान रहने पर भी विशेष रूप से अभान हो जाता है । उसका कारण यह है कि [जिस प्रति- बन्ध का वर्णन हम अगले श्लोक में करेंगे उस] प्रतिबन्ध के प्रताप से 'मैं हूँ' इस सामान्य रूप से आत्मा का भान होते रहने पर भी वह विशेष रूप से [कि मैं सच्चिदानन्द हूँ] अप्रतीत रह ही जाता है । प्रतिबन्धोऽस्तिभातीतिव्यवहारार्हवस्तुनि । तन्निरस्य विरुद्धस्य तस्योत्पादनमुच्यते ॥१३॥ जिस आत्मवस्तु का व्यवहार 'है और प्रतीति भी हो रही है' ऐसे स्पष्ट शब्दों में होना चाहिये था, उस आत्मवस्तु के उस उचित व्यवहार को हटाकर उसके उलटे 'न तो है ही और न मुझे प्रतीति ही हो रही है' ऐसे एक मिथ्या व्यवहार को उत्पन्न कर देना ही 'प्रतिबन्ध' कहाता है । तस्य हेतुः समानाभिहारः पुत्रध्वनिश्रुतौ । इहानादिरविद्यैव व्यामोहै कनिबन्धनम् ॥१४॥ पुत्र शब्द-श्रवण [ वाले दृष्टान्त ] में तो उस प्रतिबन्ध का कारण समानाभिहार [बहुतों के साथ मिलकर पढ़ना] होता है तथा इस [दाष्टान्तिक] में तो समस्त विपरीत ज्ञानों का एक मुख्य कारण अनादि [उत्पत्ति रहित] अविद्या ही प्रतिबन्ध का कारण है [अनादि अविद्या का वर्णन आगे किया गया है] । चिदानन्दमयब्रह्मप्रतिबिम्बसमन्विता । तमोरजःसत्वगुणा प्रकृति र्द्विविधा च सा ॥१५॥ चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म के प्रतिबिम्ब से युक्त, तम रज तथा सत्वगुण वाली, एक वस्तु 'प्रकृति' कहाती है । वह दो प्रकार की होती है [जिनका कि कथन अगले श्लोक में किया जायगा]।