पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१० पञ्चदशी सत्वशुद्ध्यविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते मते । मायाविम्बो वशीकृत्य तां स्यात् सर्वज्ञ ईश्वरः ॥१६॥ सत्व की शुद्धि से उस प्रकृति को 'माया'और सत्व की अशुद्धि [ मलिनता ] से उस प्रकृति को 'अविद्या' मान लिया गया है । माया में पड़ा हुआ विम्ब उस माया को वश में कर रहा है और इसी कारण से वह सर्वज्ञ ईश्वर बना बैठा है । प्रकाशात्मक सत्व गुण की शुद्धि से जब कि सत्व गुण दूसरे गुणों से कलुषित नहीं हो जाता—तब वह प्रकृति 'माया' कही जाती है । जब तो वह सत्व गुण दूसरे गुणों से कलुषित होकर अशुद्ध हो जाता है तब वही प्रकृति 'अविद्या' कहाने लगती है । संक्षेप यह है कि विशुद्ध-सत्व-प्रधान प्रकृति को 'माया' तथा मलिन सत्व-प्रधान प्रकृति को 'अविद्या'कहते हैं । माया में प्रतिफलित उस आत्मा ने माया को अपने स्वाधीन कर रक्खा है और वही सर्व- ज्ञता आदि गुणों वाला ईश्वर होगया है । अविद्यावशगस्त्वन्य स्तद्वैचित्र्यादनेकधा । सा कारण शरीरं स्यात् प्राज्ञस्तत्राभिमानवान् ॥१७॥ दूसरा तो अविद्या के वश में फँस गया है । अविद्या की विचित्रता के कारण वह अनेक होजाता है । उस अविद्या को 'कारण शरीर' कहते हैं । उस कारण शरीर कहानेवाली अविद्या में अभिमान करनेवाले को 'प्राज्ञ' मानते हैं । अविद्या में प्रतिबिम्बित होकर उसके पराधीन होजानेवाला आत्मा तो जीव कहाने लगता है । वह जीव तो उस अविद्या रूपी उपाधि की विचित्रता [ किंवा अशुद्धि की न्यूनाधिकता ] के कारण अनेक प्रकार का हो जाता है । उसके देवता मनुष्य पशु