पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वविवेकप्रकरणम् ११ पक्षी आदि अनेक भेद हो जाते हैं । वह अविद्या ही 'कारण शरीर' कहाती है, क्योंकि स्थूल सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल सूक्ष्म भूतों का वही कारण मानी गयी है । उस कारण शरीर में अभिमान करने वाले अथवा उसी में 'मैं' भावना करने वाले जीव को 'प्राज्ञ' नाम से कहा जाता है । तमःप्रधानप्रकृते स्तद्भोगायेश्वराज्ञया । वियत्पवनतेजोऽम्बुभुवो भूतानि जज्ञिरे ॥१८॥ उन [प्राज्ञों] के भोग के लिये ईश्वर की आज्ञा से तमःप्रधान प्रकृति में से आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा भूमि नाम के पांच महाभूत उत्पन्न हुए। उन प्राज्ञ नामक जीवों के सुख-दुःख-साक्षात्काररूपी भोग के लिये उस प्रकृति में से [जिस में कि तमोगुण की प्रधानता है] ईशान आदि शक्ति वाले जगत् के अधिष्ठाता की आज्ञा से [ जिसको उसका ईक्षण भी कहा जाता है ] आकाश आदि पांच भूत उत्पन्न होगये । सत्त्वांशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमाद्धीन्द्रियपञ्चकम् । श्रोत्रत्वगक्षिरसनघ्राणाख्यमुपजायते ॥ १९ ॥ उन आकाश आदि पांच भूतों के पृथक् पृथक् पांच सत्त्व भागों से क्रमानुसार श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना तथा घ्राण नाम की पांच ज्ञानेन्द्रियां उत्पन्न हो जाती हैं। [अर्थात् एक एक भूत के पृथक् पृथक् सत्त्वांश से एक एक इन्द्रिय की उत्पत्ति होती है] तैरन्तःकरणं सर्वै र्वृत्तिभेदेन तद् द्विधा । मनो विमर्शरूपं स्याद् बुद्धिः स्यान्निश्चयात्मिका॥२०॥ उन पांचों भूतों के पांचों सत्त्वांशों से मिलकर एक अन्तः-