पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 30, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ पञ्चदशी करण नाम का द्रव्य उत्पन्न हो जाता है । वह अन्तःकरण अपने वृत्तिभेद के कारण दो प्रकार का होता है । जब वह विमर्श किंवा संशयात्मिका वृत्ति करता है अथवा यों कहो कि जब वह विमर्श रूप हो जाता है तब उसको 'मन' कहा जाता है । निश्चयस्वरूप हो जाने पर उसी को 'बुद्धि' नाम से कहने लगते हैं । रजोंशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमात् कर्मेन्द्रियाणि तु । वाक्पाणिपादपायूपस्थाभिधानानि जज्ञिरे ॥२१॥ उन आकाशादि पांच भूतों के पृथक्-पृथक् पांच रजो भागों से क्रमानुसार वाक्, पाणि, पाद, पायु, तथा उपस्थ नाम की पांच कर्मेन्द्रियां उत्पन्न हो जाती हैं। तैः सर्वैः सहितैः प्राणो वृत्तिभेदात् स पंचधा । प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ च ते पुनः ॥२२॥ उन पांचों भूतों के पांचों रजो भागों से मिलकर एक प्राण का जन्म हो जाता है । वह प्राण वृत्तिभेद किंवा प्राणनादि व्यापारों के भेद से, पांच प्रकार का होता है । वे पांच प्रकार ये हैं—प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान । बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकै र्मनसा धिया । शरीरं सप्तदशभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते ॥२३॥ (पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, पांच प्राण, मन तथा बुद्धि इन सतरह पदार्थों से मिलकर 'सूक्ष्म शरीर' बनता है । उसी को वेदान्तों में 'लिंग शरीर' भी कहते हैं) प्राज्ञस्तत्राभिमानेन तैजसत्वं प्रपद्यते । हिरण्यगर्भतामीश स्तयो र्व्यष्टिसमष्टिता ॥२४॥ (वह प्राज्ञ नाम का जीव उस लिंगशरीर में अभिमान करने