पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header: तत्त्वविवेकप्रकरणम् १३]
से 'तैजस' हो जाता है तथा जब वह ईश्वर उस लिंग देह में अभिमान करता है तब वह 'हिरण्यगर्भ' हो जाता है । उन दोनों में भेद केवल इतना ही है कि तैजस 'व्यष्टि' है और हिरण्यगर्भ 'समष्टि' है ) इसके अतिरिक्त और कोई भेद नहीं है । मलिनसत्वप्रधान अविद्यारूपी उपाधि वाला जीव जब लिंग शरीर में अभिमान करता है, जब वह उसी को अपना आत्मा मान लेता है तब उसे 'तैजस' कहने लगते हैं । विशुद्ध सत्व प्रधान मायारूपी उपाधिवाला परमेश्वर उसी लिंग शरीर में जब 'मैंपने' का अभिमान करता है तब उसका नाम 'हिरण्यगर्भ' हो जाता है । तैजस और हिरण्यगर्भ दोनों ही यद्यपि लिंग शरीर पर अभि- मान करने वाले हैं परन्तु उनमें से एक 'व्यष्टि' है दूसरा 'समष्टि' है । इसी से दोनों में भेद हो गया है । समष्टीशः सर्वेषां स्वात्मतादात्म्यवेदनात् । तदभावात् ततोऽन्ये तु कथ्यन्ते व्यष्टिसंज्ञया ॥२५॥ वह ईश्वर–जिसे हिरण्यगर्भ कहा गया है–लिंगशरीर उपाधि वाले सभी तैजसों के साथ अपने आत्मा की एकता को समझता रहता है । वह समझता है कि ये सब मिलकर 'मैं' हूँ । इसी से वह 'समष्टि' होता है । उस ईश्वर से अन्य जो जीव हैं वे तो उस तादात्म्यवेदन के अभाव से [उन सब के साथ एकत्व ज्ञान के न होने से] 'व्यष्टि' नाम से कहे जाते हैं । तद्भोगाय पुनर्भोग्यभोगायतनजन्मने । पञ्चीकरोति भगवान् प्रत्येकं वियदादिकम् ॥२६॥ भगवान् परमेश्वर उसके बाद उन जीवों के भोग के लिये ही भोग्य [ अन्नपानादि ] तथा भोगमन्दिरों