पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें२५२ पञ्चदशी हो जाय वह तो हम मान लेते हैं। परन्तु उपाधि से रहित जो ब्रह्मतत्व है उसका प्रत्यक्ष होना ठीक नहीं मालूम होता ॥८३॥ इस पर सिद्धान्ती का कहना है कि—[जीव को जो] ब्रह्मरूपता का परिज्ञान होता है, वह तो सोपाधिक वस्तु को ही विषय करता है [इस कारण उस ज्ञान का विषय जो ब्रह्म है वह भी सोपाधिक ही है। तात्पर्य यह है कि—जब तक ज्ञेय सोपाधिक नहीं होगा,तब तक ज्ञान उस पदार्थ को अपना विषय ही कैसे करेगा। उपाधि के बिना तो ज्ञेय का ज्ञान होता ही नहीं] जब तक किसी को विदेह कैवल्य की प्राप्ति नहीं हो जाती है, तब तक उपाधि का निवारण तो हो ही नहीं सकता, इस कारण तब तक वह उपाधि बनी ही रहेगी और यों ब्रह्म का प्रत्यक्ष भी होता ही रहेगा। अन्तःकरणसाहित्यराहित्याभ्यां विशिष्यते । उपाधिर्जीवभावस्य ब्रह्मतयाश्च नान्यथा ॥८५॥ [इन उपाधियों की बात भी सुन लीजिये] 'अन्तःकरण का साहित्य' तो जीवभाव की उपाधि है तथा 'अन्तःकरण का राहित्य' ब्रह्मभाव की उपाधि मानी गयी है। इनकी उपाधियों में और कोई विलक्षणता नहीं है—[अन्तःकरण सहित तत्व को 'जीव' कहते हैं और अन्तःकरण रहित हो चुके हुए तत्व को 'ब्रह्म' कहते हैं। जो तत्व अभी तक अन्तःकरण सहित सा ही रहा था, वही तत्व अब अन्तःकरण से नाराज़ होकर अलग बैठ गया है। जिस तत्व को अभी तक अन्तःकरण से सहित पहचानते थे, उसी तत्व को अब अन्तःकरण से रहित रूप में जानने लगे हैं]