भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

तृप्तिदीपप्रकरणम् २५३ यथा, विधिरुपाधिः स्यात् प्रतिषेधस्तथा न किम् । सुवर्णलोहभेदेन शृङ्खलात्वं न भिद्यते ॥८६॥ विधि [अर्थात् भावरूप अन्तःकरण का सम्बन्ध] जिस प्रकार उपाधि होती है, क्या इसी प्रकार प्रतिषेध [अर्थात् अभाव- रूप, अन्तःकरण का वियोग] उपाधि नहीं हो सकता है ? तात्पर्य यह है कि हो ही सकता है । [फिर भी जो भाव या अभावरूपी अवान्तर विलक्षणता दीखती है, उसकी परवाह न करनी चाहिये। क्योंकि देखते हैं कि] सोने या लोहे के अवान्तर भेद से शृङ्खलापने में तो कोई भी भेद नहीं हो जाता। [पुरुष की स्वतन्त्रता को हरण करने में सुवर्णपने या लोहपने का कुछ भी मूल्य नहीं है । इसी प्रकार उस तत्व को चाहे अन्तःकरण से सहित रूप में पहचाना जाय या अन्तःकरण से रहित रूप में पहचाना जाय, बात एक ही है । कुण्डल वाला गुरु है कुण्डल जिस पर नहीं वह उसका विद्यार्थी, यहाँ पर कुण्डल का होना गुरु की उपाधि है । कुण्डल का न होना छात्र की उपाधि है । यों उपाधि के अवान्तर भेद को समझें तो अन्तःकरण रहित रूप में ब्रह्मतत्व जाना ही जा सकता है । ] अतद्व्यावृत्तिरूपेण साक्षाद् विधिमुखेन च । वेदान्तानां प्रवृत्तिः स्याद् द्विधेत्याचार्यभाषितम् ॥८७॥ आचार्य ने कहा है कि—वेदान्तों ने ब्रह्म का प्रतिपादन दो तरह से किया है—एक तो अतद्व्यावृत्ति रूप से, दूसरे साक्षात् विधिमुख से । अतद् अर्थात् तद् (ब्रह्म) से भिन्न जो अज्ञा- नादि हैं उनको 'नेतिनेति' करके हटा दिया जाय, किंवा अतत् जो यह प्रपंच है, उसकी व्यावृत्तिरूपी उपाय भी ब्रह्म का दर्शन