पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ पञ्चदशी करा देता है । दूसरे उस ब्रह्म के साक्षात् वाचक शब्दों का ही कथन कर दिया जाय—जैसे कि 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' इत्यादि । यही विधिमुख से किया हुआ प्रतिपादन माना जाता है । अहमर्थपरित्यागादहं ब्रह्मेति धीः कुतः । नैवमंशस्य हि त्यागो भागलक्षणयोदितः ॥८८॥ [जब वेदान्तों को अतद्व्यावृत्ति रूप से ब्रह्म का बोधक मानोगे तब] 'अहं' शब्द का अर्थ जो कूटस्थ है, उसका भी त्याग जब हो जायगा तब 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसा ज्ञान कैसे उत्पन्न हो सकेगा ? इसका उत्तर यह है कि—हम ऐसा सर्वत्याग मानते ही नहीं । हम तो 'भागलक्षणा' किंवा 'जहदजहल्लक्षणा' से अहंशब्द के अर्थ जडभागरूपी एकदेश का ही त्याग करते हैं [अहं के दूसरे अर्थ कूटस्थ अंश का त्याग हम ने नहीं माना है । ऐसी अवस्था में 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान हो ही सकता है] अन्तःकरणसं त्यागादवशिष्टे चिदात्मनि । अहं ब्रह्मेतिवाक्येन ब्रह्मत्वं साक्षिणीक्ष्यते ॥८९॥ अन्तःकरण का पूर्ण त्याग कर देने पर [अपने आत्मराज्य में से अन्तःकरण को धक्का दे देने पर] जो चिदात्मा शेष रह जाता है, 'अहं ब्रह्मास्मि' यह महावाक्य उसी शेष रहे हुए चेतन साक्षी में ब्रह्मत्व का ज्ञान कराता है । स्वप्रकाशोऽपि साक्ष्येव धीवृत्त्या व्याप्यतेऽन्यवत् । फलव्याप्यत्वमेवास्य शास्त्रकृद्भिर्निवारितम् ॥ ९० ॥