पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] तृप्तिदीपप्रकरणम् २५५
[Main Text] प्रत्यगात्मा को बुद्धिवृत्तियाँ कैसे विषय करेंगी ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि] स्वयंप्रकाश भी वह साक्षी अन्य घटादियों के समान धीवृत्तियों से व्याप्त तो हो ही जाता है [तभी तो 'मैं स्वयंप्रकाश हूँ' ऐसी बुद्धिवृत्ति का होना सम्भव हो गया है ] यह बात हम सिद्धान्त से बाहर की नहीं कह रहे हैं क्योंकि शास्त्रकारों ने यही तो कहा है कि फल [अर्थात् वृत्ति में प्रति- विम्बित चिदाभास] इस आत्मा को व्याप्त नहीं करता [क्योंकि वह तो स्वयं ही स्फुरणरूप होता है । आत्मा की वृत्ति की व्याप्ति को तो पूर्वाचार्य भी मानते ही हैं। वे तो केवल फल की व्याप्ति का निषेध करते हैं] बुद्धितत्स्थचिदाभासौ द्वावपि व्याप्तुतो घटम् । तत्राज्ञानं धिया नश्येदाभासेन घटः स्फुरेत् ॥९१॥ [जब हमें घट दीखता है तब] बुद्धि भी और उसमें पड़ा हुआ चिदाभास भी दोनों ही घट को व्याप्त किया करते हैं [दोनों के व्याप्त करने के फल भी पृथक् पृथक् देख लो कि] उन दोनों में से बुद्धिवृत्ति से तो अज्ञान नष्ट हो जाता है— [क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का परस्पर विरोध है] तथा दूसरा जो चिदाभास है उस से घट की स्फूर्ति हुआ करती है [क्योंकि जड होने के कारण घट में स्वयं स्फुरण की योग्यता नहीं होती] ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता । स्वयंस्फुरणरूपत्वान्नाभास उपयुज्यते ॥९२॥ [प्रत्यगात्मा और ब्रह्म की जो एकता थी उसको अज्ञान ने आवृत कर रक्खा था] ब्रह्म में के उस अज्ञान का नाश करने