पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें२५६ पञ्चदशी के लिये वृत्ति की व्याप्ति तो अपेक्षित होती है— [महावाक्यों को सुनकर 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी जो एक बुद्धिवृत्ति उत्पन्न हुआ करती है, वह वृत्ति ब्रह्म को व्याप्त करले, केवल यही बात आवश्यक है] परन्तु स्वयं स्फुरणरूप होने के कारण, उसकी स्फूर्ति कराने के लिये, फिर चिदाभास का कुछ भी उपयोग नहीं रह जाता [ऐसी अवस्था में वह चिदाभास भले ही ब्रह्म से युक्त हो भी जाता हो तो भी उसमें उसका कुछ भी उपयोग नहीं होता। वह तो सूरज के सामने लाये हुए दीपक की तरह ब्रह्म- तत्व के सामने निकम्मा हो जाता है, या उस ही में लीन हो कर एक हो जाता है। यों वह उसे देख नहीं पाता।] चक्षुर्दीपावपेक्ष्येते घटादेर्दर्शने यथा। न दीपदर्शने किन्तु चक्षुरेकमपेक्ष्यते ॥९३॥ [अन्धेरे से ढके हुए] घटादि को देखने में चक्षु और दीपक दोनों ही अपेक्षित होते हैं। परन्तु दीपक को देखने में तो वैसा नहीं होता। किन्तु एक चक्षु ही चक्षु अपेक्षित होती है [इसी प्रकार ब्रह्म में अज्ञान का नाश करने के लिये वृत्ति की व्याप्ति तो मान लेनी चाहिये किन्तु उसके स्फुरण के लिये आभास का कुछ उपयोग नहीं होता] स्थितोऽप्यसौ चिदाभासो ब्रह्मण्येकीभवेत् परम्। न तु ब्रह्मण्यतिशयं फलं कुर्याद् घटादिवत् ॥९४॥ जो वृत्तियाँ ब्रह्म को विषय किया करती हैं, उनमें भी यद्यपि चिदाभास रहता है, परन्तु वह ब्रह्म से पृथक् होकर नहीं भासता। किन्तु [प्रचण्ड धूप में जलते हुए दीपप्रकाश के समान] ब्रह्म के साथ एकीभाव को प्राप्त हो जाता है।