पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५८ पञ्चदशी बार सुनकर विचार करने पर ] अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है यह तो हम माने लेते हैं , परन्तु ऐसा बोध दृढ तो नहीं होता क्योंकि श्रीमच्छङ्कराचार्य ने वाक्यार्थ ज्ञान के उत्पन्न हो जाने के बाद भी श्रवण आदि की आवृत्ति करने को कहा है । [ वह उन्होंने ज्ञान की दृढता के ही लिये तो कहा है । इसी से समझते हैं कि महावाक्य से हुआ अपरोक्ष ज्ञान टिकाऊ नहीं होता ] अहं ब्रह्मेति वाक्यार्थबोधो यावद् दृढीभवेत् । शमादिसहितस्तावदभ्यसेच्छ्रवणादिकम् ॥९८॥ आचार्य ने कहा है कि—जब तक किसी को अपने ब्रह्मभाव का दृढ निश्चय न हो जाय, तब तक शमदमादि से युक्त होकर, श्रवणादि का अभ्यास किया ही करे। बाढं सन्ति ह्यदार्ढ्यस्य हेतवः श्रुत्यनेकता । असंभाव्यत्वमर्थस्य विपरीता च भावना ॥९९॥ जो कि शब्दप्रमाण से उत्पन्न हुआ ज्ञान दृढ नहीं होता, उसका कारण एक तो श्रुतियों की अनेकता होती है [ कोई श्रुति कुछ कहती है, दूसरी श्रुति कुछ और ही बता देती है ] दूसरे अलौकिक होने के कारण अखण्डैकरस अद्वितीय ब्रह्म- रूपी अर्थ की संभावना ही साधारण प्राणी के हृदय में नहीं हो पाती। तीसरे विपरीत भावनाओं ने भी प्राणियों के हृदय पर पूर्णाधिकार जमा रक्खा है, [ कर्तृत्व भोक्तृत्व के वृथा अभिमान से प्राणियों को इतनी फुर्सत ही नहीं मिलती कि वे अपने ब्रह्मत्व का किंवा अपने असंग रूप का कभी विचार भी कर सकें ] ।