भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

तृप्तिदीपप्रकरणम् २५९ शाखाभेदात् कामभेदाच्छ्रुतं कर्मान्यथाऽन्यथा । एवमत्रापि मा शङ्कीत्यतः श्रवणमाचरेत् ॥१००॥ [ श्रुतियों के नाना होने से यदि यह ज्ञान दृढ न होता हो, तो उसका उपाय इस श्लोक में बताया गया है ] शाखा के भिन्न भिन्न होने से कर्म भिन्न भिन्न हो जाता है । इसी प्रकार कामना के भिन्न भिन्न होने से भी कर्मों में भेद आ जाता है । ऐसा ही कोई भेद ज्ञानकाण्ड में भी होता होगा, इस शंका [ भेदशंका ] को हटाने के लिये बार बार श्रवण करते रहो । वेदान्तानामशेषाणामादिमध्यावसानतः । ब्रह्मात्मन्येव तात्पर्यमिति धीः श्रवणं भवेत् ॥१०१॥ आदि मध्य और अन्त में कहीं से भी विचार करने पर सब वेदान्तों [ किंवा उपनिषदों ] का परम निष्कर्ष ब्रह्म को प्रत्यगात्मारूप बताने में ही है,ऐसा निश्चय 'श्रवण' कहाता है । समन्वयाध्याय एतत् सूक्तं,धीस्वास्थ्यकारिभिः । तर्कैः संभावनार्थस्य द्वितीयाध्याय ईरिता ॥१०२॥ व्यास मुनि ने इसी 'श्रवण'को वेदान्त दर्शन के समन्वय नाम के प्रथमाध्याय में भली रीति से वर्णन किया है । प्रमेय को समझने में जो जो अड़चनें हों, उन सब को हटाकर, बुद्धि का सन्तोष कर देने वाले तर्कों किंवा युक्तियों से, अर्थ की संभावना करना [ कि श्रवण किया हुआ अर्थ यों यों संभव है ] 'मनन' कहाता है । इस मनन का निरूपण उन्होंने द्वितीयाध्याय में किया है । बहुजन्मदृढाभ्यासाद् देहादिष्वात्मधीः क्षणात् । पुनः पुनरुदेत्येवं जगत्सत्यत्वधीरपि ॥१०३॥