पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० पञ्चदशी विपरीता भावनेयमैकाग्र्यात् सा निवर्तते । तत्त्वोपदेशात् प्रागेव भवत्येतदुपासनात् ॥१०४॥ अनन्त जन्मों का दृढ अभ्यास हो गया है, उसके कारण देहादि को जो आत्मा समझने के और जगत् को सत्य सम- झने के वृथा विचार फिर फिर उत्पन्न हुआ करते हैं, बस यही तो 'विपरीत भावना' कहाती है । यह विपरीत भावना एका- ग्रता से नष्ट हो जाती है । यह एकाग्रता तो ब्रह्मोपदेश से पहले पहले ही उपासना से कर लेनी चाहिये । उपास्तयोऽतएवात्र ब्रह्मशास्त्रेऽपि चिन्तिताः । प्रागनभ्यासिनः पश्चाद् ब्रह्माभ्यासेन तद् भवेत् ॥१०५॥ यही कारण है कि उपासनाओं की चिन्ता ब्रह्म शास्त्र [ वेदान्त शास्त्र ] में भी की गयी है । जिसने तो ब्रह्म ज्ञान होने से पहले एकाग्रता का अभ्यास नहीं किया होता, उसको तो ब्रह्माभ्यास करते रहने से ही एकाग्रता हो जाती है । तच्चिन्तनं तत्कथन मन्योऽन्यं तत्प्रबोधनम् । एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः ॥१०६॥ ब्रह्म का ही चिन्तन करने को, उसी की बात करने को, एक दूसरे को उसी को समझाने को तथा सदा केवल तन्निष्ठ हो जाने को ही ज्ञानी लोग ब्रह्माभ्यास कहते हैं । [ ऐसा ब्रह्माभ्यास करते करते ज्ञानी का चित्त एकाग्र हो जाता है ] तमेव धीरो विज्ञायः प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद् बहूञ्छब्दान् वाचो विग्लापनं हि तत् ॥१०७॥ धीर [अर्थात् ब्रह्मचर्यादिसाधन से युक्त] ब्राह्मण [ अर्थात् ब्रह्मभाव चाहने वाले मुमुक्षु ] को उचित है कि उसी प्रत्यग्रूप