भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २६१ परमात्मा को पूर्ण रूप से जान ले [ जिससे उसमें किसी प्रकार का संशयादि न रह जाय] इतना कर चुकने पर फिर प्रज्ञा किंवा एकाग्रता को करले [ अर्थात् ब्रह्मात्मैकता के ज्ञान की एक निरन्तर धारा बहादे] अनात्मा को विषय करनेवाले शब्दों का ध्यान [ और कथन दोनों ही] छोड़ दे। क्योंकि वह ध्यान और वह कथन वाणी और मन की थकावट का ही तो कारण होता है। [शब्दों का ध्यान करने से मन थकता है तथा शब्दों को बोलने से वाणी को श्रम होता है। यों श्रुति ने अपने मुख से इसी ब्रह्मनिष्ठता का वर्णन किया है।] अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥१०८॥ जो महापुरुष मुझसे अनन्य होकर मेरा चिन्तन करते करते सदा मेरी ही उपासना किया करते हैं-[सदा मद्रूप ही हुए रहते हैं] नित्य ही मुझमें लगे हुए [मेरे गम्भीर अन्तस्तल तक पहुँचे हुए] उन उपासकों के भोजनाच्छादि का प्रबन्ध और उनके धन की रक्षा का भार मेरे कन्धों पर रहता है। क्योंकि उन्होंने तो मुझको ही अपना आत्मा समझ लिया है। वे फिर अपने भोजनादि के प्रबन्ध की चिन्ता नहीं करते । जिस प्रकार कोई ग्वाला किसी पशु को चराना छोड़ देता है तो उस पशु का स्वामी उसे नहीं छोड़ बैठता । फिर तो वह स्वयं ही उसके खान पान की देखभाल किया करता है। इसी प्रकार यदि कोई साधक ज्ञानावेश में आकर या भक्ति के उद्रेक में फँस कर शरीर के निर्वाह की चिन्ता छोड़ देता है तो समष्टि का अभिमानी उसके निर्वाह को अपने जिम्मे