पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ पञ्चदशी तुरन्त ही आत्मतत्व का स्मरण कर लेता है उसे विपरीत ज्ञान होने का तो कोई अवसर ही नहीं मिलता । तत्त्वस्मृतेरवसरो नास्त्यन्याभ्यासशालिनः । प्रत्युताभ्यासघातित्वाद् बलात् तत्त्वमुपेक्ष्यते ॥१२७॥ जो पुरुष अनात्मपदार्थों का अभ्यास किया करता है, उसको तो तत्त्वस्मरण का अवकाश [ मौक़ा=फुर्सत ] ही नहीं मिलता । इतना ही नहीं प्रत्युत ऐसे अभ्यास ब्रह्माभ्यास के विघातक होते हैं । उस समय तो स्मरण किया हुआ तत्व भी बलात् भूल जाता है । तमेवैकं विजानीथ ह्यन्या वाचो विमुञ्चथ । इति श्रुतं तथान्यत्र वाचो विग्लापनं त्विति ॥१२८॥ तत्त्वस्मरण के विरोधी काव्यतर्कादि के अनुशीलन को छोड़ने की बात 'तमेवैकं विजानीथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैष सेतुः' (मुण्ड२५-२) इस श्रुति में तथा (नानुध्यायाद्बहूञ्शब्दा न्वाचो विग्लापनं हि तत्) (बृह० ४-४-२१) इस श्रुति में कही गयी है । आहारादि त्यजन्नैव जीवेच्छास्त्रान्तरं त्यजन् । किं न जीवसि, येनैवं करोष्यत्र दुराग्रहम् ॥१२९॥ भोजनादि का त्याग करके तो कोई जीवित नहीं रह सकता । क्या तुम उसी तरह दूसरे अनात्मशास्त्रों का त्याग करके जीवित नहीं रह सकते हो ? जिससे ऐसा दुराग्रह किये जा रहे हो । जनकादेः कथं राज्यमिति चेद् दृढबोधतः । तथा तवापि चेत् तर्कं पठ यद्वा कृषिं कुरु ॥१३०॥