भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २६९ यदि यह पूछो कि—जनकादि तत्त्ववेत्ताओं ने राज्य का पालन आदि कैसे किया था ? तो उसका उत्तर यह है कि वे तो दृढबोध के कारण वैसा कर सके थे [उनका अपरोक्षज्ञान बड़ा दृढ था। उससे उनकी प्रवृत्ति उनके आत्मचिन्तन में बाधक नहीं होती थी] जनकादि जैसा ही दृढबोध यदि तुमको भी हो चुका हो, तो तुम भी चाहे तो तर्क पढ़ो, या खेती करने लगो। [पक्षी अपने नन्हे बच्चों को तभी तक अपने निवास में रखते हैं, जब तक उनके पंख पक नहीं जाते। पंखों के पक जाने पर तो वे उन्हें चोंचों से मार मार कर बाहर निकाल देते हैं। इसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी को तभी तक सांसारिक कर्मों से बचने को कहा जाता है जब तक उसका ज्ञान पक नहीं जाता। पंखों के पक जाने पर पक्षियों के बच्चे चाहे जहां उड़ें, इसी प्रकार ज्ञान के पक जाने पर ज्ञानी लोग चाहे जो कुछ करें,फिर उनका ज्ञानदीपक बुझता नहीं। प्रत्युत उनका व्य- वहार उनके ज्ञान को पकाता रहता है] मिथ्यात्ववासनादार्थ्ये प्रारब्धक्षयकाङ्क्षया। अक्लिश्यन्तः प्रवर्तन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः ॥१३१॥ जिन लोगों की संसारमिथ्यात्व की वासना दृढ हो जाती है [संसार की असारता को जानने वाले] वे तत्त्वज्ञानी भी प्रारब्ध को क्षय करने की ही एक मात्र इच्छा से, बिना किसी खेद के, अपने अपने कर्मों के अनुसार, प्रवृत्ति किया करते हैं [क्योंकि प्रारब्ध का फल तो अवश्य ही मिलता है, उसका क्षय तो केवल भोग से ही हो सकता है, इस विचार को लेकर ज्ञानियों की प्रवृत्ति हुआ करती है। प्रारब्ध के अनुसार आये