भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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[Header] तृप्तिदीपप्रकरणम् २७१

की अदूरता का ज्ञान नहीं होता] दीनबुद्धि होकर मार्ग में ही बैठ रहता है । साक्षात्कृतात्मधीः सम्यगविपर्ययबाधितः । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीर मनुसंज्वरेत् ॥१३५॥ आत्मा को साक्षात्कार कर लेने वाली बुद्धि, जिसके हाथ लग गयी है, जो कभी भी विपरीत ज्ञान से बाधित नहीं होता है [जो कभी भी देहादि को आत्मा नहीं समझता है ] ऐसा महापुरुष बताओ तो सही कि किस वस्तु की चाह में फँसकर तथा किसके लिये, मांस के ढेर इस शरीर के पीछे पीछे दुःखी होता फिरे ? [ऐसे ज्ञानी को तो दुःखी होने की कुछ आवश्य- कता ही नहीं रह जाती] जगन्मिथ्यात्वधीभावादाक्षिप्तौ काम्यकामुकौ । तयोरभावे सन्तापः शाम्येन्निःस्नेहदीपवत् ॥१३६॥ क्योंकि इस ज्ञानी को जगत् के मिथ्या होने की बुद्धि उत्पन्न हो गयी है, इस कारण ज्ञानी की उदार दृष्टि में न तो कामना करने का पदार्थ रहता है और न कामना करने वाला ही, शेष रहता है। जब कि इस संसाररूपी गाड़ी को चलानेवाले काम्य और कामुक नाम के ये दो पहिये ही न रहे तब बिचारा सन्ताप इस प्रकार शान्त हो जाता है, मानो तेल के न रहने से कोई दीपक ही बुझ गया हो । गन्धर्वपत्तने किंचिन्मैन्द्रजालिकनिर्मितम् । जानन् कामयते किन्तु जिहासति हसन्निदम् ॥१३७॥ ऐन्द्रजालिक की बनाई हुई समझ लेने के कारण, गन्धर्व- नगर की किसी भी वस्तु की कामना, कोई नहीं करता। प्रत्युत