पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें'यह तो झूठी है' इस प्रकार हँस कर उसे छोड़ देना चाहता है [इस दृष्टान्त से यह समझ लो कि—जब काम्य पदार्थ नहीं रहता तब कामना भी नहीं होती] । आपातरमणीयेषु भोगेष्वेवं विचारवान् । नानुरज्यति, किन्त्वेतान् दोषदृष्ट्या जिहासति ॥१३८॥ ऊपर के दृष्टान्त के अनुसार जो माला, चन्दन, स्त्री आदि भोग केवल देखने में ही रमणीक मालूम होते हैं, उनको आपात- रमणीक समझ लेने वाला पुरुष, उनमें आसक्ति नहीं करता । किन्तु वह तो दोषों को देख कर इनको छोड़ देना ही चाहता है । अर्थानामर्जने क्लेशस्तथैव परिपालने । नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थान् क्लेशकारिणः ॥१३९॥ [विषयों के दोष तो ये हैं जिनको कि ज्ञानी देखा करता है] सम्पत्ति के उपार्जन में साधारण कष्ट नहीं होता । उसकी रक्षा करने में तो उससे भी अधिक दुःख भोगना पड़ जाता है । वह सम्पत्ति जब अपनी आंखों के सामने नष्ट होती है या व्यय होने लगती है तब उस दुःख को भी सभी जानते हैं । प्रत्येक अवस्था में दुःख देने वाले इन भोगों को धिक्कार ही है। मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोलेऽङ्गपंजरे । स्नाय्वस्थिग्रन्थिशालिन्याः स्त्रियाः किमिव शोभनम् ॥१४०॥ नाड़ियों, हड्डियों और मांस के मोटे मोटे लोथड़ों वाली, मांस की पुतली इस स्त्री के, यन्त्र की तरह के इस चंचल शरीर रूपी पींजरे में खूबसूरत चीज़ ही क्या है ? [यही बात विवेकी की समझ में नहीं आती] ।