भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 726 में से

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २७५ विवेक को बेकार न समझना चाहिए। विवेकी लोगों में यह विशेषता होती है कि वे शरीरयात्रा के लिए तो थोड़ा बहुत भोगसंग्रह कर लेते हैं परन्तु व्यर्थ मनोरथों का जाल कभी नहीं फैलाते। वे जब किसी भोग को भोगते हैं उस समय भी उस भोग्य के अन्दर के आत्मतत्व को याद रखते हुए भोगते हैं। यों वे भोगों को भोगते हुए भी भोगों में नहीं उलझते। प्रत्युत भोगों को भोगर्तँ हुए भी उनका आत्मसाधन चलता है और वे भोगों को भोगते हुए भी मुक्ति का मार्ग साफ़ करते रहते हैं। यों उनकी भोगभूमि ही समाधि का अंग बन जाती है।] परिज्ञायोपभुक्तो हि भोगो भवति तृप्तये । विज्ञाय सेवितश्चोरो मैत्रीमेति न चोरताम् ॥१४८॥ [जो भोग विवेकमूलक होता है, उससे तृप्ति हो जाती है, यह अनुभव से भी सिद्ध होता है। देखो कि] जान कर भोगा हुआ भोग तृप्ति कर देता है। यह चोर है ऐसा जानकर सेवित किया हुआ चोर, उसके लिए चोर नहीं रहता। वह तो उसका मित्र बन जाता है। यह भोग 'इतना है' 'इसकी सत्यता इतनी है' 'इतनी कठिनाइयों से यह हमें मिलना है' यह सब समझ कर जब किसी भोग को भोगा जाता है तब उससे तुरन्त ही तृप्ति हो जाती है-उसे दूर से ही नमस्कार करने को जी चाहता है। लोक में भी देखते हैं कि-यह चोर है ऐसा जान लेने पर, जब उस चोर के साथ रहा जाता है तब वह चोर उस पुरुष के लिए चोर नहीं रहता। किन्तु वह तो उसका मित्र बन जाता है।

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