भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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२७६ पञ्चदशी यों यद्यपि भोगों से तृष्णा की वृद्धि होती है परन्तु जब विवेक नाम का साथी मिल जाता है तब उन भोगों से ही तृप्ति भी होने लग जाती है ] । मनसो निगृहीतस्य लीलाभोगोऽल्पकोऽपि यः । तमेवालब्धविस्तारं क्लिष्टत्वाद् बहु मन्यते ॥१४९॥ [योगाभ्यास से] जिस मन का निग्रह कर लिया जाता है, उस मन को जो थोड़ा सा भी लीलाभोग मिल जाता है, वह मन, भोगों के दोषयुक्त होने के कारण, उसी संक्षिप्त (थोड़े से) भोग को अधिक मान लेता है । अर्थात् थोड़े से ही तृप्ति मान बैठता है । बद्धमुक्तो महीपालो ग्राममात्रेण तुष्यति । परैर्न बद्धो नाक्रान्तो न राष्ट्रं बहु मन्यते ॥१५०॥ देखते हैं कि—जिस राजा को कोई शत्रु क़ैद करके छोड़ देता है, तो फिर वह एकाध गांव को अपनी जीविका के लिए लेकर ही सन्तुष्ट हो जाता है । परन्तु जिस राजा पर न तो किसी ने कभी आक्रमण किया हो और न जो कभी किसी से बांध लिया गया हो, वह तो समूचे राष्ट्र को भी कुछ नहीं समझता । विवेके जाग्रति सति दोषदर्शनलक्षणे । कथमारब्धकर्मापि भोगेच्छां जनयिष्यति ॥१५१॥ नैष दोषो यतोऽनेकविधं प्रारब्धमीक्ष्यते । इच्छानिच्छा परेच्छा च प्रारब्धं त्रिविधं स्मृतम् ॥१५२॥ दोषदर्शन रूपी विवेक जब कि जाग रहा हो तब प्रारब्ध कर्म भी भोग की इच्छा को कैसे उत्पन्न कर सकेगा ?