पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृप्तिदीपप्रकरणम् २७७ इच्छा का विघात करने वाला विवेकज्ञान तो भोगेच्छा को उत्पन्न ही नहीं होने देगा] ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि [दोष दीखने पर भी इच्छाएँ पैदा होती हुई पाई जाती हैं] प्रारब्ध कर्म अनेक प्रकार के पाये जाते हैं । एक इच्छा को पैदा करके भोग देने वाला प्रारब्ध । दूसरा अनिच्छा के रहने पर भी भोग देने वाला प्रारब्ध । तीसरा परेच्छा से भोग देने वाला प्रारब्ध । यों तीन प्रकार का प्रारब्ध माना जाता है । [ विवेक के पहरे में भी भोगेच्छा कैसे हो जाती है ? इस प्रश्न को समझने के लिए प्रारब्ध के इन तीन भेदों को समझ लेना आवश्यक है ] । अपथ्यसेविनश्चोरा राजदाररता अपि । जानन्त एव स्वानर्थ मिच्छन्त्यारब्धकर्मतः ॥१५३॥ अपथ्यसेवी,रोगी,चोर, तथा राजा की स्त्री से रमण करने वाले, ये सभी अपने भावी अनर्थों को जानते हुए भी, आर- ब्धकर्म के शासन [ प्रभाव ] में आकर वैसी वैसी उलटी इच्छायें किया करते हैं । न चात्रैतद् वारयितु मीश्वरेणापि शक्यते । यत ईश्वर एवाह गीतायामर्जुनं प्रति ॥१५४॥ ईश्वर भी आये तो इन अपथ्यसेवन आदि की इच्छाओं को रोक नहीं सकता । [ ये इच्छायें अपरिहार्य होती हैं । इसी कारण इन इच्छाओं को प्रारब्ध का फल माना गया है ] ईश्वर ने स्वयं अपने मुख से गीता में अर्जुन के प्रति यही बात कही है कि ये इच्छायें अपरिहार्य होती हैं । सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृते र्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥१५५॥