भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २७९ और कृष्ण के प्रश्नोत्तर से ही ज्ञात हो जाती है । अब आगे इसी "अनिच्छाप्रारब्ध" का वर्णन सुन लो । अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः ॥१५९॥ अर्जुन का प्रश्न यह है कि—हे श्रीकृष्ण ! यह पुरुष न चाहने पर भी किस की प्रेरणा से पाप कर बैठता है ? मानों किसी ने उस को ज़बरदस्ती उस पाप में लगाया हो । काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥१६०॥ श्रीकृष्ण ने यह उत्तर दिया कि—यह जो कोई पदार्थ पुरुष को प्रवृत्त करने वाला है वह रजोगुण से उत्पन्न हुआ 'काम' है। यही 'काम' कभी 'क्रोध' का रूप भी धारण कर लेता है । यह काम 'महाशन' है [ इस की मांग बहुत ही बड़ी है ] यही बड़े बड़े पापों की जननी है । इस कारण इस 'काम' को अपना बैरी जानो । [ भाव यह है कि—प्रारब्ध के वश से बढ़े हुए रजोगुण से, जब काम या क्रोध उत्पन्न हो जाते हैं, तब ये ही पुरुष की प्रवृत्ति के कारण होते हैं। ऐसे स्थलों पर प्रवृत्ति का मूल कारण इच्छा नहीं होती । स्वस्थ होने पर जिस काम को करने की इच्छा तक नहीं होती काम और क्रोध के वेग से वही काम प्राणी कर बैठता है । इसी से अनि- च्छा प्रारब्ध सिद्ध होता है ] स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥१६१॥ हे कौन्तेय ! अपने स्वभावजकर्म से